वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें७६४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण- न्यायकन्दली त्यात् । न च प्रत्यक्षागृहीतेऽर्थे सङ्केतग्रहणमस्तीत्यभावे शब्दस्याप्रवृत्तिरेव । न च तस्मिन् प्रतीयमाने श्रोतुरर्थविषया प्रवृत्तिः स्यात्, भावाभावयोरन्त्यादसम्बन्धाच्च । स्वलक्षणात्मकत्वेनाभावप्रतीतावविवेकेन स्वलक्षणे प्रवृत्तिरिति चेत् ? १दृश्य- विकल्प्यावर्थावेकीकृत्यात्तत्संन्निवेशिभ्यो भ्रान्त्या प्रतिपत्तिः प्रतिपत्तृणामिति । तदयुक्तम् । अप्रतीते तदात्मकतया अभावसमारोपानुपपत्तेः । न च श्रोतुस्तदानीमर्थप्रतिपत्तिरस्ति शब्द- स्यातद्विषयत्वात् प्रमाणान्तरस्याभावात् । अस्ति च शब्दार्थे प्रवृत्तिस्तस्मान्नाभावोऽपि शब्दार्थः । न चान्यदेकं निमित्तं किञ्चिदस्ति । सर्वमिदमर्थजातं परस्परव्यावृत्तं प्रतिक्षणम- पूर्वमपूर्वमनुभूयमानं न शब्दात् प्रतीयते । नापि प्रत्यक्षाप्रतीतमपि हानोपादानविषयो भवेत्, अपरिज्ञातसामर्थ्यात् । अस्ति च शब्दो व्यवहारः, अस्ति च प्राण- से किसी भी भावार्थ में प्रवृत्ति नहीं होगी; क्योंकि (घटादि) भाव और उनमें रहनेवाला (अपोहरूप) अभाव दोनों भिन्न हैं । एवं परस्पर विरोधी होने से अपोह एवं घटादि पदार्थ दोनों का सम्बन्ध भी सम्भव नहीं है । (प्र.) घटादि की स्वलक्षणा प्रतीति और अपोह की प्रतीति दोनों में भेद-बुद्धि न रहने के कारण (अपोह के वाचक घटादि शब्दों से घटादिविषयक) प्रवृत्तियाँ होती हैं । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि- 'दृश्य अर्थ और समारोपित अर्थ जो वस्तुतः परस्पर सम्बद्ध नहीं हैं, उन दोनों को एक समझकर ही सुननेवाले की तद्विषयक प्रवृत्ति उत्पन्न होती है । (उ.) किन्तु यह कहना भी अयुक्त है । अज्ञात वस्तु (भाव) में अभिन्न रूप से अभाव (अपोह) का आरोप भी नहीं किया जा सकता । उस समय (शब्द को सुनने के बाद) श्रोता को अर्थ का ज्ञान नहीं है; क्योंकि शब्द प्रामाणिक (गवादि) अर्थों का बोधक प्रमाण नहीं है । एवं उस समय शब्द को छोड़ दूसरा प्रमाण उपस्थित भी नहीं है; किन्तु शब्द से (घटादि) अर्थों में प्रवृत्ति होती है । अतः (घटादि शब्दों के घटत्वादि रूप से घटादि भाव ही अर्थ हैं, अपोह रूप से) अभाव नहीं । (घटत्वादि) सामग्रियों को छोड़कर शब्दों का कोई एक (प्रवृत्ति) निमित्त नहीं है । यह कहना भी सम्भव नहीं है कि जितने भी अर्थ उत्पन्न होते हैं वे सभी परस्पर भिन्न हैं और प्रतिक्षण नये-नये ही उत्पन्न होते हैं और उन्हीं अर्थों का शब्द से अनुभव होता है । एवं (सामान्य के न मानने पर) प्रत्यक्ष के द्वारा अज्ञात व्यक्तियों में प्रवृत्ति और निवृत्ति नहीं होगी, (किन्तु प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात व्यक्ति के सजातीय) उन
- यहाँ मुद्रित पाठ को यथावत् मानना उचित नहीं जान पड़ता । अतः "दृश्यविकल्प्यौ" इसके पहले 'यथोक्तम्' इतना अधिक जोड़कर एवं 'प्रतिपत्तिः' इसके स्थान में 'प्रवृत्तिः' ऐसा पाठ मानकर अनुवाद किया गया है । ये दोनों ही पाठभेद नीचे के पाठभेदों में भी मुद्रित हैं ।