भारतकोश
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

पृष्ठ 739, कुल 759 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 739

७७२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | विशेषनिरूपण- न्यायकन्दली प्रत्यवायकरत्वं तयोगात् । तत्सम्बन्धादन्येषामशुचित्वम् । तथेहापि तादात्म्याद- त्यन्तव्यावृत्तिस्वभावत्वादनन्यविशेषेषु स्वत एव स्वरूपादेव प्रत्ययव्यावृत्तिर्न विशेषान्तर- सम्भवात्¹ । अतदात्मकेषु तु परमाणुषु सामान्यधर्मकेषु विशेषयोगादेव प्रत्ययव्यावृत्तिरुक्ता न स्वरूपमात्रादिति । नित्यद्रव्येषु सर्वेषु परस्परसधर्मसु । प्रत्येकमनुवर्तन्ते विशेषा भेदहेतवः ॥ ॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां विशेषपदार्थः समाप्तः ॥ नहीं होती है; क्योंकि प्रदीप में स्वतः प्रकाश होता है । इसी प्रकार गौ, अश्व प्रभृति के मांस अपने तो वे स्वतः 'अशुचि' हैं; किन्तु निषिद्ध मांसों को छूनेवाले पुरुष में प्रत्यवाय की कारणता उन (मांसों) के स्पर्श से आती है । एवं उस पुरुष से सम्बन्ध रखनेवाली वस्तुओं में जो अशुचिता होगी, उसके कारण उन वस्तुओं के साथ उस पुरुष को सम्बन्ध है । इसी प्रकार प्रकृत में भी अत्यन्तव्यावृत्ति-स्वभाव के अन्य-विशेषों में व्यावृत्ति-प्रत्यय 'स्वतः' अर्थात् उनके अत्यन्तव्यावृत्ति-स्वभाव के कारण ही होता है । इसके लिए दूसरे 'विशेष' के सम्बन्ध की अपेक्षा नहीं है । 'अतदात्मक' अर्थात् एक सामान्य धर्मवाले परमाणुओं में जो व्यावृत्ति-बुद्धि होगी, उसके लिए उनमें 'विशेष' पदार्थ का सम्बन्ध ही कारण है । उसकी उत्पत्ति स्वतः नहीं हो सकती । एक साधारण धर्म से युक्त सभी नित्य द्रव्यों में से प्रत्येक में परस्पर भेद (व्यावृत्ति) के लिए उनमें से प्रत्येक में अलग विशेष का मानना आवश्यक है; क्योंकि वे ही उनमें व्यावृत्ति-बुद्धि के कारण हैं । ॥ भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रचित एवं पदार्थों के सम्यक् ज्ञान में समर्थ न्यायकन्दली नाम की टीका का विशेषनिरूपण समाप्त हुआ ॥

  1. यहाँ 'न विशेषान्तरसम्भवात्' इसके स्थान में 'न विशेषान्तरसम्बन्धात्' ऐसा पाठ उचित जान पड़ता है, अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।