वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 759 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ९३ न्यायकन्दली वाक्यार्थी स्याताम्, प्रत्यक्षस्य च काञ्चिदर्थक्रियामभिसन्धायोपलिप्सिते विषये प्रवृत्तस्यार्थक्रिया प्रमेया स्यात् । जनकत्वेन प्रवृत्तिपरत्वं वेदान्तानामपि विद्यते, तेभ्यः स्वरूपप्रतीतौ ध्यानाभ्यासादिप्रवृत्तस्य विगतविविधविकल्पविशदात्मज्ञानोदये सत्यपवर्गस्य भावात्। न चेदमावश्यकं यत्प्रवृत्तिनिवृत्त्यवधिकः प्रमाणव्यापार इति, तयोः पुरुषेच्छाप्रति- बद्धयोरनुत्पादेऽपि वस्तुपरिच्छेदमात्रेणापेक्षाबुद्धेः पर्य्यवसानात् । न च कार्यान्वित एवार्थे पदानां शक्तिः, अनन्वितेऽपि व्युत्पत्तिदर्शनात् । यथेह प्रभिन्नकमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबतीति वर्त्तमानापदेशे प्रसिद्धेतरपदार्थोऽप्रसिद्धमधुकरपदार्थस्तु यं मधुपानकर्त्तारं पश्यति तं मधुकर- वाच्यत्वेन प्रत्येति । अत्राप्यस्ति पारम्पर्येण कार्यान्वयो वाक्यप्रयोक्तुः, वृद्धव्यवहारे कार्यान्वित- पदार्थे मधुकरपदस्य व्युत्पत्तिभावादिति चेत् ? न, अनिश्चयात् । वाक्यप्रयोक्तुः किं कारणता से ही अगर प्रतिपादकता मान ली जाय तो) मन में किसी कार्यविशेष की इच्छा से उत्पन्न तंन्प्रयोजकीभूत किसी विषय के प्रत्यक्ष का वह विशेष कार्य प्रमेय होगा । कारणत्व रहने से ही अगर प्रतिपादकत्व मान लिया जाय तो फिर वेदान्त-वाक्य भी प्रवृत्ति के वाचक ही हैं । क्योंकि उनसे भी स्वरूप अर्थविषयक बोध के बाद ध्यान, अभ्यासादि में प्रवृत्त पुरुष को अनेक प्रकार के विकल्पों से रहित आत्मा के यथार्थज्ञान के उदय से अपवर्ग की प्राप्ति अवश्य होती है । यह आवश्यक नहीं है कि (शब्द) प्रमाण के व्यापार की अवधि प्रवृत्ति और निवृत्ति ये ही दो मानी जाएँ । क्योंकि पुरुष की इच्छा से नियमतः प्रवृत्ति और निवृत्ति की उत्पत्ति न होने पर भी वस्तुओं का 'परिच्छेद' अर्थात् इष्टसाधनत्वादि का परिचय देकर के ही अपेक्षा-बुद्धि चरितार्थ हो जाती है¹ । यह भी नियम नहीं है कि कार्य में अन्वित अर्थों में ही शब्दों की शक्ति है; क्योंकि कार्य में अनन्वित अर्थों में भी शब्दों की शक्ति देखने में आती है। जैसे "प्रभिन्न- कमलोदरे मधूनि मधुकरः पिबति" (अर्थात् फूले कमल के बीच "मधुकर" मधु को पीता है) इत्यादि वाक्य के 'मधुकर' शब्द से जिस व्यक्ति को पहले से (उक्त वृद्ध- व्यवहार की रीति से) 'मधुकर' पद के अर्थ का ज्ञान नहीं भी है, वह भी वर्त्तमान- कालिक उस मधुपान क्रिया में रत भ्रमर को 'मधुकर' शब्द का वाच्य समझ लेता है । (प्र.) बोद्धा को कार्यान्वित अर्थ में शक्ति गृहीत न होने पर भी वक्ता को तो कार्य में अन्वित अर्थ में ही शक्ति गृहीत है, क्योंकि उसका शक्तिज्ञान वृद्धव्यवहार- मूलक ही है । अतः साक्षात् न सही, परम्परा से मधुकर शब्द की शक्ति कार्यत्व- विशिष्ट अर्थ में ही है । (उ.) यह आक्षेप भी अनिश्चय के कारण असङ्गत है;
- पहले प्रमाण से यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति होती है । तदनन्तर उस ज्ञात ईप्सित विषय की इच्छा उत्पन्न होती है, अथवा द्वेष उत्पन्न होता है। ईप्सित