वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)
Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary
भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा
DevanagariHindipublished835 पृष्ठ
पृष्ठ 458, कुल 835 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 458
गेऽपि। तेषामपि प्रकरणादिवशेन स्मृतौ वृत्तिसंभवात्॥ न यदि। ३।२।११३॥ यद्योगे- उक्तं न॥ अभिजानासि कृष्ण यद्वने अभुञ्ज्महि॥ विभाषा साकाङ्क्षे। ३।२।११४॥ उक्तविषये लृद्वा स्यात् लक्ष्यलक्षणभावेन साकाङ्क्षश्चेदर्थः॥ स्मरसि कृष्ण वने वत्स्याम- स्तत्र गाश्चारयिष्यामः। वासो लक्षणं चारणं लक्ष्यम्। पक्षे लङ्। यच्छब्दयोगेऽपि न यदीति बाधित्वा परत्वाद्विकल्पः॥ परोक्षे लिट्। ३।२।११५॥ चकार। उत्तमपुरुषे चित्तविक्षेपादिना पारोक्ष्यम्। सुप्तोऽहं किल विललाप। बहु जगद पुरस्तात्तस्य मत्ता किला- हम्॥ अत्यन्तापह्नवे लिड्वक्तव्यः * ॥ कलिङ्गेष्ववात्सीः। नाहं कलिङ्गान् जगाम॥ हशँ- श्वतोर्लङ् च। ३।२।११६॥ अनयोरुपपदयोर्लिट्विष