भारतकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

पृष्ठ 630, कुल 835 में से

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पृष्ठ 630

महाराजाह्ठञ् ॥ ९७॥ वासुदेवार्जुनाभ्यां वुन् ॥ ९८ ॥ गोत्रक्षत्रियाख्येभ्यो बहुलं वुञ् ॥ ९९ ॥ जनपदिनां जनपदवत् सर्वं जनपदेन समानशब्दानां बहुवचने ॥ १०० ॥ ५ ॥ तेन प्रोक्तम् ॥ १०१ ॥ तित्ति रिवरतन्तुखण्डिकोखाच्छण् ॥ १०२ ॥ काश्यपकौशिकाभ्यामृषिभ्यां णिनिः ॥ १०३ ॥ कलापिवैशम्पायनान्तेवासिभ्यश्च ॥ १०४ ॥ पुराणप्रोक्तेषु ब्राह्मणकल्पेषु ॥ ॥ १०५ ॥ शौनकादिभ्यश्छन्दसि ॥ १०६ ॥ कठचरकाल्लुक् ॥ १०७ ॥ कलापिनोऽण् ॥ ॥ १०८ ॥ छगलिनो ढिनुक् ॥ १०९ ॥ पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयोः ॥११०॥ कर्मन्दकृ- शाश्वादिनीः ॥ १११ ॥ तेनैकदिक् ॥ ११२ ॥ तसिश्च ॥ ११३ ॥ उरसो यच्च ॥ ११४ ॥ उपज्ञाते ॥ ११५ ॥ कृते ग्रन्थे ॥ ११६ ॥ संज्ञायाम् ॥ ११७ ॥ कुलालादिभ्यो वुञ् ॥ ११८ ॥ क्षुद्राभ्रमरवटरपादपादञ् ॥ ११९ ॥ तस्येदम् ॥ १२० ॥ ६ ॥ रथाद्यत् ॥ १२१ ॥ पत्रपू- र्वादञ् ॥ १२२ ॥ पत्राध्वर्युपरिषदश्च ॥ १२३ ॥ हलसीराट्ठक् ॥ १२४ ॥ द्वन्द्वाद्वुन् वैरमैथुनि- कयोः ॥ १२५ ॥ गोत्रचरणाद्वुञ् ॥ १२६ ॥ सङ्घाङ्कलक्षणेष्वञ्यञिञामण् ॥ १२७ ॥ शाकलाद्वा ॥ १२८ ॥ छन्दोगौक्थिकयाज्ञिकबह्वृचनटाञ्ण्यः ॥ १२९ ॥ न दण्डमाणवा- न्तेवासिषु ॥ १३० ॥ रैवतिकादिभ्यश्छः ॥ १३१ ॥ कौपिञ्जलहास्तिपदादण् ॥ १३२ ॥ आथर्वणिकस्येकलोपश्च ॥ १३३ ॥ तस्य विकारः ॥ १३४ ॥ अवयवे च प्राण्योषद्विवृक्षेभ्यः ॥ १३५ ॥ बिल्वादिभ्योऽण् ॥ १३६ ॥ कोपधाच्च ॥ १३७ ॥ त्रपुजतुनोः षुक् ॥ १३८॥ ओरञ् ॥ १३९ ॥ अनुदात्तादेश्च ॥ १४० ॥ ७ ॥ पलाशदिभ्यो वा ॥ १४१ ॥ शम्याः प्लञ् ॥ १४२ ॥ मयड्वैतयोर्भाषायामभक्षाच्छादनयोः ॥ १४३ ॥ नित्यं वृद्धशरादिभ्यः १४४॥ गोश्चपुरीषे ॥ १४५ ॥ पिष्टाच्च ॥ १४६ ॥ संज्ञायां कन् ॥ १४७ ॥ व्रीहेः पुरोडाशे ॥ १४८ ॥ असंज्ञायां तिलयवाभ्याम् ॥ १४९ ॥ द्व्यचश्छन्दसि ॥ १५० ॥ नोत्वदूर्ध्ववि- ह्वात् ॥ १५१ ॥ तालादिभ्योऽण् ॥ १५२ ॥ जातरूपेभ्यः परिमाणे ॥ १५३ ॥ प्राणिरज- तादिभ्योऽञ् ॥ १५४ ॥ ञितश्च तत्प्रत्ययात् ॥ १५५ ॥ क्रीतवत् परिमाणात् ॥ १५६ ॥ उष्ट्राद्वुञ् ॥ १५७ ॥ उमौर्णयोर्वा ॥ १५८ ॥ एण्या ढञ् ॥ १५९ ॥ गोपयसोर्यत् ॥ १६०॥ ॥ ८ ॥ द्रोश्च ॥ १६१॥ माने वयः ॥ १६२॥ फले लुक् ॥ १६३॥ प्लक्षादिभ्योऽण्॥१६४॥ जम्ब्वा वा ॥ १६५ ॥ लुक् च ॥ १६६ ॥ हरीतक्यादिभ्यश्च ॥ १६७ ॥ कंसीयपरश- व्ययोर्यञ्ञौ लुक् च ॥ १६८ ॥ ८ ॥ ( युष्मद्गोमन्तात्सम्भूते ग्रामाद्वेतुतेन रथात्पलाशादि- भ्यो द्रोश्चाष्टौ ) ॥ ॥ इति चतुर्थाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ३ ॥ प्राग्वहतेष्ठक् ॥ १ ॥ तेन दीव्यति खनति जयति जितम् ॥ २ ॥ संस्कृतम् ॥ ३ ॥ कुलत्थकोपधादण् ॥ ४ ॥ तरति ॥ ५ ॥ गोपुच्छाट्ठञ् ॥ ६ ॥ नौद्व्यचष्ठन् ॥ ७ ॥ चरति ॥ ८ ॥ आकर्षात् ष्ठल् ॥ ९ ॥ पर्णादिभ्यः ष्ठन् ॥ १० ॥ श्वगणाट्ठञ् च ॥ ११ ॥ वेतना- दिभ्यो जीवति ॥ १२ ॥ वस्त्रक्रयविक्रयाट्ठन् ॥ १३ ॥ आयुधाच्छ च ॥ १४ ॥ हरत्युत्सङ्गादिभ्यः

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