भारतकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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( ४२ ) अष्टाध्यायी- च ॥ ४३ ॥ तस्य तात् ॥ ४४ ॥ तस्तनप्तनथनाश्च ॥ ४५ ॥ इदन्तो मसि ॥ ४६ ॥ क्त्वो यक् ॥ ४७ ॥ ष्ट्रीनमिति च ॥ ४८ ॥ स्नाल्वादायश्च ॥ ४९ ॥ आजसेरसुकू ॥ ५० ॥ अश्वक्षीरवृषलवणानामात्मप्रीतौ क्यचि ॥ ५१ ॥ आमि सर्वनाम्नः सुट् ॥ ५२ ॥ त्रेस्त्रयः ॥५३॥ ह्रस्वनद्यापो नुट् ॥ ५४ ॥ षट्चतुर्भ्यश्च ॥ ५५ ॥ श्रीग्रामण्योश्छन्दसि ॥ ५६ ॥ गोः पादान्ते ॥ ५७ ॥ इदितो नुम्धातोः ॥ ५८ ॥ शे मुचादीनाम् ॥ ५९ ॥ मस्जिनशोर्झलि ॥ ॥ ६० ॥ ३ ॥ रधिजभोरचि ॥ ६१ ॥ नेट्यलिटि रधेः ॥ ६२ ॥ रमेरशब्लिटोः ॥ ६३ ॥ लभेश्च ॥ ६४ ॥ आडो यि ॥ ६५ ॥ उपात्प्रशंसायाम् ॥ ६६ ॥ उपसर्गात्खल्वञोः ॥ ६७ ॥ न सुदुर्भ्यां केवलाभ्याम् ॥ ६८ ॥ विभाषा चिण्णमुलोः ॥ ६९ ॥ उगिदचां सर्वनामस्थानेऽ- धातोः ॥ ७० ॥ युजेरसमासे ॥ ७१ ॥ नपुंसकस्य झलचः ॥ ७२ ॥ इकोऽचि विभक्तौ ॥ ॥ ७३ ॥ तृतीयादिषु भाषितपुंस्कं पुंवद्गालवस्य ॥ ७४ ॥ अस्थिदधिसक्थ्यक्ष्णामनडुदात्तः ॥ ॥ ७५ ॥ छन्दस्यपि दृश्यते ॥ ७६ ॥ ई च द्विवचने ॥ ७७ ॥ नाभ्यस्ताच्छतुः ॥ ७८ ॥ वा नपुंसकस्य ॥ ७९ ॥ आच्छीनद्योर्नुम् ॥ ८० ॥ ४ ॥ श्यश्नोनित्यम् ॥ ८१ ॥ सावन- डुहः ॥ ८२ ॥ दृक्श्ववस्श्वतवसां छन्दसि ॥८३॥ दिव औत् ॥ ८४ ॥ पथिमथ्यृभुक्षामात् ॥ ॥ ८५ ॥ इतोऽत्सर्वनामस्थाने ॥ ८६ ॥ थो न्थः ॥ ८७ ॥ भस्य टेर्लोपः ॥ ८८ ॥ पुंसो- ऽसुङ् ॥ ८९ ॥ गोतो णित् ॥ ९० ॥ णलुत्तमो वा ॥ ९१ ॥ सख्युरसंबुद्धौ ॥ ९२ ॥ अनङ् सौ ॥ ९३ ॥ ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसां च ॥ ९४ ॥ तृज्वत् क्रोष्टुः ॥ ९५ ॥ स्त्रियां च ॥ ॥ ९६ ॥ विभाषा तृतीयादिष्वचि ॥ ९७ ॥ चतुरनडुहोरामुदात्तः ॥ ९८ ॥ अम्संबुद्धौ ॥ ॥ ९९ ॥ ऋत इद्धातोः ॥ १०० ॥५॥ उपधायाश्च ॥१०१॥ उदोष्ठ्यपूर्वस्य ॥ १०२॥ बहुलं छन्दसि ॥ १०३ ॥ ३ ॥ ( युवोरष्टाभ्यो लोपो रधिशप्यनोरुपधायास्त्रीणि ) ॥ इति सप्तमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १ ॥ सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु ॥ १ ॥ अतो ल्रान्तस्य ॥ २ ॥ वदव्रजहलन्तस्याचः ॥ ३ ॥ नेटि ॥ ४ ॥ ह्यन्तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम् ॥ ५ ॥ ऊर्णोतेर्विभाषा ॥ ६ ॥ अतो हला- देर्लघोः ॥ ७ ॥ नेडूशि कृति ॥ ८ ॥ तितुत्रतथसिसुसरकसेषु च ॥ ९ ॥ एकाच उपदेशे ऽनुदात्तात् ॥ १० ॥ श्र्युकः किति ॥ ११ ॥ सनि ग्रहगुहोश्च ॥ १२ ॥ कृसृमृवृस्तुद्रुस्रुश्रुवो लिटि ॥ १३ ॥ श्रीदितो निष्ठायाम् ॥ १४ ॥ यस्य विभाषा ॥ १५ ॥ आदितश्च ॥ १६ ॥ विभाषा भावादिकर्मणोः ॥ १७ ॥ क्षुब्धस्वान्तध्वान्तलग्नम्लिष्टविरिब्धफाण्टवाढानि मन्थमन्- स्तमःसक्ताविस्पष्टस्वरानायासभृशेषु ॥ १८ ॥ धृषिंशास्तौ वैयात्ये ॥ १९ ॥ दृढः स्थूलबलयोः ॥ २० ॥ १ ॥ प्रभौ परिवृढः ॥ २१ ॥ कृच्छ्रगहनयोः कषः ॥ २२ ॥ घुषिरवि- शब्दने ॥ २३ ॥ अर्देः संनिविभ्यः २४ ॥ अमेक्षाविदूर्र्ये ॥ २५ ॥ णेरध्ययने वृत्तम् ॥ २६ ॥ वा दान्तशांतपूर्णदस्तस्पष्टच्छन्नज्ञाताः ॥ २७ ॥ रुष्यमत्वरंसंघृपा- स्वनाम् ॥ २८ ॥ हृषेर्लोमसु ॥ २९ ॥ अपचितश्च ॥ ३० ॥ हु ह्वेश्चन्दसि ॥ ३१ ॥