वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)
Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary
भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा
DevanagariHindipublished835 पृष्ठ
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( २१४ ) वार्तिकसूची ।
| वार्तिकानि | पृष्ठाङ्काः | वार्तिकानि | पृष्ठाङ्काः | वार्तिकानि | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|---|---|
| शेषे विभाषा | १०८ | समाहारे चायमिष्यते | ११७ | सोपसर्गस्य न | ४४२ |
| श्वदन्तरुप० | ४८६ | समिधामाधाने० | २०४ | स्तने धेटो० | ४३२ |
| श्वविष्ठाषाढाभ्यां० | १९९ | समोऽक्रूजने | ३९१ | स्तोमे डविधिः | २१७ |
| श्व्यजीषि० | ४८४ | समो वा लोपमेके | १८ | स्त्रियां न | १३ |
| श्रेण्यादिषु च्व्यर्थवचनं० | १२७ | सम्राजः क्षत्रिये | ८१ | स्त्रियामपत्ये० | १७७ |
| श्वयते० | ३१६ | सर्वजनाट्ठञ्० | २१३ | स्त्रीनपुंसकयोः० | २४८ |
| श्वशुरस्वोकाराकारलोपश्च | ८७ | सर्वत्रपन्नयोरुप० | ४३३ | स्त्रीप्रत्यययोरकाकार० | १०८ |
| श्वेतवहादीनां० | ४९९ | सर्वनामसंख्ययो० | १५० | स्थाम्नोऽकार० | १६९ |
| षट्त्वे षड्गवञ्च | २२६ | सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे० | १२५ | स्थेणोलुँङीति व० | १५२ |
| षष उत्त्वं दतृदशधा० | १३६ | सर्वप्रातिपदि० | ३८१ | स्नेहे तैलच् | २२६ |
| षष्ठाजादिव० | २३९ | सर्वप्रातिपदिके० | ३८२ | स्पृशमृश० | ३१३ |
| षष्ठ्यर्थे चतु० | ४९७ | सर्वाण्णो वेति० | २१३ | स्यान्तस्योपोत्तमं | ५१७ |
| षष्ठ्यामन्त्रित० | ५१६ | सर्वादेश्च | २३४ | स्वज्ञेरुपसं० | ३१२ |
| षाद्यञ्श्चाब्वाच्यः | ८८ | सर्वादेः सादेश० | १८८ | स्वतिभ्यामेव | १५८ |
| संख्यापूर्वपदानां० | २१४ | सर्वोभयार्था० | ३३५ | स्वरत्यादे० | ४९१ |
| संख्याया अल्पीयस्याः | १५० | सविशेषणस्य प्रतिषेधः | १३७ | स्वरदीर्घयलोप० | २७६ |
| संख्याया नदीगो० | १५७ | सस्थानत्वं नमः० | ३२४ | स्वराद्यन्तोपसर्गा० | ३९८ |
| संख्यायास्तत्पुरु० | १४५ | सहायाद्वा० | २२४ | स्ववःस्वतवसो० | ५१० |
| संधाते कटच् | २२६ | सहितसहायाभ्यां चेति० | ८८ | स्वाङ्गकर्मकाचे० | ३१३ |
| संज्ञायां वा | ८३ | साधुकारिण्यु० | ४३५ | स्वादीरेरिणोः | १० |
| संज्ञायामण् | २२० | साध्वसाधुप्रयोगे च | ११० | स्वार्थ उपसंख्यानम् | १८७ |
| संज्ञायामिति | ५२९ | सामान्ये नपुंसकम् | १३८ | हनुचलन इति | १८५ |
| संनिपाताच्चेति० | २१६ | सासाहिवावांह० | ४४९ | हनो वा यद्वध० | ४१८ |
| संपदादिभ्यः० | ४८५ | सिक्लोप एकादेशे० | २६९ | हन्तेर्घत्वं च | ४२५ |
| संपुंकानां सो० | १८ | सिति च | १३ | हन्तेर्हिंसायाम्० | ३७५ |
| संबुद्धौ नपुंसका० | ५५ | सिनोतेर्घासक० | ४३७ | हरेतेरप्रति० | ३९१ |
| संभ्रमाजिह्नशण० | ७४ | सिन्बहुलं नि० | ५०० | हरतेर्गतिता० | ३९२ |
| संभ्रमेण प्रवृत्तौ० | २४७ | सुडपि हर्षा० | २९२ | हरिद्रामहार० | १८३ |
| संवत्सरात्फल० | १९८ | सुदिनहुर्दिन० | ३८५ | हरितक्यादिषु० | १९१ |
| सकर्मकाणां प्र० | ४०७ | सुदुरोरधिकर० | ४३३ | हलिकल्योर० | ३८६ |
| सतिशिष्टस्वरव० | ५१५ | सुब्धातुश्विषु० | २७३ | इत्यादिभ्यो० | ३८६ |
| सत्रकक्षकष्टकृच्छ्र० | ३८४ | सुसर्वादिर्दिक्शब्देभ्यो० | १९८ | हस्तिसूचकयो० | ४२८ |
| सदच्चकाण्डप्रान्तश० | ७४ | सूचिसूत्रिमूत्र्य० | ३७३ | हितयोगे च | १०० |
| सनि णमुलि० | ३२७ | सूतकापुत्रिका० | ७६ | हिमाचेल्लः | २३३ |
| समवपूर्वाच्च | ४२१ | सृतयुवत्याम् | १८२ | हिमारण्ययोर्महत्त्वे | ८४ |
| समश्च बहुलम् | ४२० | सूत्रान्तात्त्वक० | १८७ | हिरण्य इति० | ४९९ |
| समानवाक्ये निघा० | ६१ | सूत्रे च धार्ये० | ४२८ | हुग्रहोर्भश्छ० | ५०० |
| समानस्य० | २३५ | सूर्यागस्त्ययोश्छे० | ८२ | हृदयाच्चालुरन्य० | २३३ |
| समानान्ययोश्चे० | ४३४ | सूर्याद्देवतायां चाब्वाच्यः | ८४ | हृद्युभ्यां च | १५९ |
| समासेप्रत्यय० | ६ | सुजियुभ्यो० | ४०८ | हृदय्या उप० | ५०५ |
| सृजेः श्रद्धोपपन्ने० |