वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)
Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary
भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा
DevanagariHindipublished835 पृष्ठ
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उणादिसूत्रसूची । ( २२१ )
| पृष्ठाङ्काः | सूत्रा० | पृष्ठाङ्काः | सूत्रा० | पृष्ठाङ्काः | सूत्रा० |
|---|---|---|---|---|---|
| ४६८ | पुरः कुषन् | ४६५ | भन्देर्नलोपश्च | ४७० | माच्छाशसिभ्यो यः |
| ४७३ | पुरसि च | ४५४ | भातेर्डवतुः | ४५४ | मिथिलादयश्च |
| ४७३ | पुरुखाः | ५५९ | भियःक्रुकन् | ४७१ | मिथुने मनिः |
| ४७२ | पुवो ह्रस्वश्च | ५५६ | भियः ष्णुच्चा | ४७२ | मिथुनेऽसि० |
| ४६७ | पुषः कित् | ४५६ | भियः पुग्रस्वश्च | ४६९ | मिपीड्यां वः |
| ४७४ | पूजो यण्लुक् ह्रस्वश्च | ४६२ | भुजिमृद्भ्यां० | ४५४ | मीनातेरूरन् |
| ४७३ | पूर्ववच्च सर्वम् | ४७१ | भुजेः किच्च | ५५३ | मुकुरदण्डौ |
| ४६५ | पृषिराञ्जभ्यां कित् | ४६३ | भुवो णिच्च | ४५६ | मुदिग्रोर्गणौ |
| ४६८ | पृनहिकलिभ्य० | ४६७ | भुवश्च | ४५९ | मुपेर्दीर्घश्च |
| ४५२ | पृभिदिव्योवृधि० | ४६१ | भुवः कित् | ४६१ | मुहेः किच्च |
| ४७० | प्र ईर शदोस्तुट् च | ४६८ | भुवः कित् | ४७४ | मुहेः खो मूर्व |
| ४५२ | प्रथिप्रदिभ्रस्जां० | ४७३ | भूराञ्जभ्यां कित् | ४५४ | मूलेरादयः |
| ४७५ | प्रथेरमच् | ४७२ | भूवादिग्गुभ्यो० | ४६९ | मूशक्यादिभ्यः कः |
| ४५६ | प्रथः कित्सं प्रसारणं च | ४६० | भूसूभ्रांस्जि० | ४६८ | मृकणिभ्यामौचिः |
| ४५६ | प्रथेः षिवन्सं० | ४६० | भृञ उच्च | ४५३ | मृगयवादयश्च |
| ४६४ | प्रदेपिँट् | ४५६ | भृञः किन्मुट् च | ४५५ | मृषो रतिः |
| ४५९ | प्राडि पणिकषः | ४६५ | भृञीश्वित् | ४५४ | मृजेर्गुणश्च |
| ४७५ | प्राततेररन् | ४६५ | भृमृदृशियजिपविप० | ४५५ | मृजेष्टिलोपश्च |
| ४६७ | प्रे स्थः | ४५१ | भृमृशीतृचरित्स० | ४६७ | मूडः कीकन्कैकणौ |
| ४७१ | प्रे हरतेः कृपे | ४६० | भ्रमेश्च डुः | ४६७ | मृकणिभ्यामूको० |
| ४६६ | प्लाविकुपिशुषिभ्यः० | ४७० | भ्रमेः संप्रसारणं च | ४६२ | यजिमांनशुन्धि० |
| ४६३ | प्लुषेरच्चोपधायाः | ४७१ | भ्रैस्जगामिनमिहानि• | ४६१ | यतेर्वृद्धिश्च |
| ४६७ | फर्फरीकादयश्च | ४७५ | मङ्गेरलच् | ४६६ | यापोः किद्वे च |
| ४५२ | फलिपाटिनमिमनि० | ४५३ | मद्गुरादयश्च | ४५६ | युजिरुचितिजां० |
| ४७४ | फलेरितजादेश्च पः | ४७० | मनेरुच्च | ४६० | युधिवुधिदृशि |
| ४६३ | फलेर्गुक् च | ४६१ | मनेधिश्चान्दसि | ४५६ | युध्यसिभ्यां मदिँक् |
| ४६२ | फेनमीनौ | ४६४ | मनेर्दीर्घश्च | ४५२ | यो द्वे च |
| ४६२ | बन्धेस्त्रिविधुषी च | ४६७ | मन्थः | ४६० | रञ्जेः क्युन् |
| ४६७ | बलाकादयश्च | ४५३ | मन्दिवाशिमाथिच० | ४७२ | रपेरत एत्व |
| ४५८ | बहुलमन्यत्रापि० | ४७४ | मव्येतर्यलोपो० | ४५२ | रपेरिच्चोपधायाः |
| ४५९ | बहुलमन्यत्रापि | ४७३ | मसेरुरन् | ४५५ | रमेर्वीद्धिश्च |
| ४६० | बहुलमन्यत्रापि | ४५३ | मसेश्च | ४५९ | रमे रश्च लो वा |
| ४५९ | बहुलमन्यत्रापि | ४६८ | मस्जेर्नुञ्च | ४७३ | रमेश्र्च |
| ४६१ | बहुलमन्यत्रापि | ४५२ | महीत ह्रस्वश्च | ४६२ | रमेस्त च |
| ४६० | बहुलमन्यत्रापि | ४५९ | महेरिणण्व | ४६८ | रम्भीत् |
| ४७१ | बृंहेर्नोऽच्च | ४७४ | माङ उ |