भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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आद्यसंख्याग्रहणम् एकत्वादीनां संख्यानां ग्रहणम् ज्ञानं प्रतिपत्तये शतत्वादीनां उपायः तथा वाक्यस्फोटप्रतिपत्तये शब्दान्तरश्रुतिः अवान्तरदेवदत्तादिपदश्रवणमु- पाय इत्यर्थः। शतत्वादिसंख्याया अयमेकः अयमेक इत्येवंरूपापेक्षाबुद्धिजन्यत्वेन प्रका- रान्तरेण ग्रहीतुमशक्यतया तद्ग्रहणेच्छायामेकत्वादिसंख्याग्रहणं तद्ग्रहणोपायः प्रथमं गृह्यते शतत्वरमैकत्वप्रत्ययेन ततोऽत्यन्तविलक्षणायाः शतत्वादिसंख्यायाः प्रत्ययम् एवं वाक्यस्फोटस्य वर्णपद्भिन्नत्वेऽपि वर्णपदग्रहणं अखण्डवाक्यप्रत्ययोपाय इति भावः ॥ ८७ ॥ जैसे सौ संख्या और एक संख्या परस्पर भिन्न है फिर एक संख्या का ज्ञान सौ संख्या के ज्ञान में सहायक है। वैसे वाक्य स्फोट और वर्ण तथा पद परस्पर भिन्न हैं फिर भी वाक्य के बीच के पदों की प्रतीति वाक्य स्फोट की प्रतीति में उपाय है ॥ ८७ ॥ इदानीं वाक्ये पदाभावे पदे वर्णाभावे वर्णे वर्णावयवाभावे च सति वाक्यादि