वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् ११५ दीपप्रभान्याय मानते हैं। क्योंकि वीचीतरङ्ग में सब दिशाओं में तरङ्ग का प्रसार नहीं होता और दीपकी प्रभा का अथवा कदम्बगोलक का हर दिशा में प्रसार होता है] ॥ १०४ ॥ अध्यवहितश्लोकाभ्यामुक्तमर्थं स्पष्टयति— इसे उदाहरण द्वारा स्पष्ट करते हैं। द्रव्याभिघातातप्रचितौ भिन्नौ दीर्घप्लुतावपि । कम्पे तूपरते जाता नादा वृत्तेर्विशेषकाः ॥ १०५ ॥ द्रव्यं स्थानं करणं च तयोरभिघातः शब्दहेतुभूतसंयोगः कण्ठादिभिर्वायूनां संयोग इति यावत्, तस्मात् द्रव्याभिघातात् भिन्नौ दीर्घप्लुतावपि प्रचितौ ध्वनिकारणवायुसंयोगप्रचयात् दीर्घप्लुतयोः प्रचयः विशिष्टप्रयत्नजनितेन वायुना स्थानेषु अभिघातो जायते तेन च वायौ कम्पो भवति तेनाभिघातपरम्परा भवति । यथा महता प्रयत्नेन वादितायां घण्टायामधिककालं घण्टायां कम्पोऽनुवर्तते तेन च घण्टामध्यस्थेन ( लम्बकेन ) विजुलीपदव्यपदेश्येन पुनः । पुनरभिघातो भवति स च कम्पः शब्दस्वरूपलाभपर्यन्तमनुवर्तते तस्मिन् कम्पे स्पन्दे उपरते निवृत्ते सति जाता नादाः वैकृतध्वनयः वृत्तेर्द्रुतावृत्तेः विशेषकाः भेदव्यवस्थाहेतवो भवन्ति न तु दीर्घप्लुतादेरिति भावः ॥ स्थान और प्रयत्नरूपी द्रव्य में अभिघात ( कण्ठादि स्थानों में वायु के संयोग ) से प्रचित ( बढ़े हुए ) दीर्घ और प्लुत आदि भेद हैं। इस अभिघात के जनक कम्पन के समाप्त होने पर जो नाद उत्पन्न होता है उसी से द्रुता आदि वृत्तियों के भेद की स्थापना होती है। दीर्घप्लुत आदि की नहीं। इदमत्रावधेयम्—नित्यशब्दपक्षे ध्वनीनां मात्रिकत्वात् नित्ये शब्दे मात्रि- कत्वमारोप्यते इति ह्रस्वत्वादिकं नाकारादिधर्मः कार्यशब्दपक्षे तु अकारादीनामेव मात्रिकत्वाद् ह्रस्वत्वादिकं तन्निष्ठमेव वैकृतध्वनिकृतभेदाभावस्तु पक्षद्वयेऽपि समान इति ॥ १०५ ॥ तात्पर्य यह कि शब्द की उत्पत्ति के पहले जितने कम्प हैं वे प्राकृत ध्वनि के हैं और शब्द के उत्पन्न होने के बाद जो अनुरणन है वह वैकृत ध्वनि का विषय है। नित्यशब्द वादियों के मत से ध्वनि ही मात्रिक है ह्रस्वत्व और दीर्घत्व आदि धर्म ध्वनि के हैं और शब्द पर उनका आरोप होता है। कार्य शब्द वादी के मत से तो अकार ही मात्रिक है और ह्रस्वत्व आदि धर्म उसी के हैं। इस प्रकार दोनों पक्षों से यह सिद्ध हुआ कि ह्रस्वत्व आदि धर्म वैकृत ध्वनि के भेद नहीं हैं ॥ १०५ ॥ मतान्तरमाह— अनवस्थितकम्पेऽपि करणे ध्वनयोऽपरे । स्फोटादेवोपजायन्ते ज्वाला ज्वालान्तरादिव ॥ १०६ ॥ करणे दन्तादौ अनवस्थितकम्पेऽपि अनुवर्त्तमानकम्पेऽपि अपरे ध्वनयः