वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ११ ] आपकी रचित टीकायें १. मुक्तावलीमयूख न्याय २. तत्त्वचिन्तामणि ( मंगळवाद ) " ३. तर्कसंग्रहदीपिकामयूख " ४. वाक्यपदीय भावप्रदीप व्याकरण ५. लघुमंजूषा ( आकांक्षानोग्यता प्रकरण ) " ६. भाट्टचिन्तामणिमयूख मीमांसा ७. खण्डनरत्नमालिका ( खण्डनखाद्य टीका ) वेदान्त इनके अतिरिक्त प्रायः १५ ग्रन्थों का आपने सम्पादन किया जो चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय अथवा सरस्वतीभवन पुस्तकालय में मुद्रित हैं। ऊपर लिखे हुए ग्रन्थों में प्रायः समस्त चौखम्बा संस्कृत सीरीज में मुद्रित हैं। वाक्यपदीय पर अन्य टीकायें वाक्यपदीय पर कुछ लोगों ने केवल छात्रों के लिए कुछ टीकायें रखी हैं जो इतनी संक्षिप्त हैं कि इन्हें महत्त्व देना आवश्यक नहीं है। इनमें श्रीदू देश झा तथा श्रीनारायणदत्त शास्त्री ( नृसिंह ) जी की टीका अवश्य उल्लेखनीय हैं। इधर श्री पं० रघुनाथ शास्त्री जी ने समस्त वाक्यपदीय पर टीका लिखना आरम्भ किया है जो भर्तृहरि की वृत्ति के आधार पर रची जा रही है तथा भावबोध के लिए बड़ी सरल भी है। यदि इस महाविद्वान् को संस्कृत विश्वविद्यालय ने इस कार्य में रत रखने की व्यवस्था की तथा इस ग्रन्थरत्न का मुद्रण किया तो वाक्यपदीय का सचमुच उद्धार हो जायगा। अब हम आगे वाक्यपदीय ग्रन्थ का कुछ संक्षिप्त परिचय देना चाहते हैं जिसमें प्रकृत काण्ड का विशेष तथा शेष काण्डों का सामान्य परिचय होगा। वाक्यपदीय वाक्यपदीय के तीन काण्ड में से प्रथम काण्ड अथवा ब्रह्मकाण्ड आगमसमुच्चय काण्ड है। इस काण्ड में आचार्य भर्तृहरि ने वाक्यपदीय के दार्शनिक आधार का चित्रण किया है। प्रथम काण्ड का प्रतिपाद्य विषय प्रथम काण्ड मुख्यतः आगमकाण्ड कहा जाता है। इस काण्ड में शब्द को ब्रह्म के रूप में स्वीकार किया है। आचार्य भर्तृहरि ने शब्द को अनादिनिधन, अक्षर, जगत्कारण, नित्य और चेतन स्वीकार किया है। शब्द ब्रह्म अपनी स्वतन्त्र शक्ति 'कालशक्ति' के द्वारा समस्त जगत् की उत्पत्ति अथवा अभिव्यक्ति को नियन्त्रित मानता है। इसीलिए इनके यहाँ एक ही शब्द से एक काल में अनेक कार्य नहीं उत्पन्न होते। उस ब्रह्म का स्वरूप और प्राप्ति का मुख्य उपाय 'वेद' है, जो एक है, किन्तु महर्षियों के द्वारा विभिन्न रूप में अभ्यस्त होने के कारण अनेक रूप का हो गया है। वह वेद अनेक अङ्गों और उपाङ्गों से युक्त है, जिसमें व्याकरण वेद का प्रधान अंग है और व्याकरण के द्वारा प्रत्यगात्म स्वरूप शब्द ब्रह्म का साक्षात्कार होता है जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है। शब्द, अर्थ और उनका सम्बन्ध भी नित्य है, जिनमें प्रकृति प्रत्यय आदि की कल्पना उनके साधुस्वरूप के साक्षात्कार के लिए