वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १९ ] चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन और युद्धोपक्रम १०१ पीनाः सशस्त्राः परिघोपमाश्च भुजास्तथाऽष्टादश भान्ति तस्याः। पराक्रमं वै भवतो विदित्वा कामेन यन्त्रा इव ते कृतास्तु॥ ६ मध्यं च तस्यास्त्रिवलीतरङ्गं विभाति दैत्येन्द्र सुरोमराजि। भयात्तुरारोहणकातरस्य कामस्य सोपानमिव प्रयुक्तम्॥ ७ सा रोमराजी सुतरां हि तस्या विराजते पीनकुचावलग्ना। आरोहणे त्वद्व्यकातरस्य स्वेदप्रवाहोऽसुर मन्मथस्य ॥ ८ नाभिर्गभीरा सुतरां विभाति प्रदक्षिणाऽस्याः परिवर्तमाना। तस्यैव लावण्यगृहस्य मुद्रा कंदर्पराज्ञा स्वयमेव दत्ता ॥ ९ विभाति रम्यं जघनं मृगाक्ष्याः समंततो मेखलयाऽवजुष्टम् । मन्याम तं कामनराधिपस्य प्राकारगुप्तं नगरं सुदुर्गम् ॥ १० वृत्तावरोमौ च मृदू कुमार्याः शोभेत ऊरू समनुत्तमौ हि। आवासनार्थं मकरध्वजेन जनस्य देशाविव संनिविष्टौ ॥ ११ तज्जानुयुग्मं महिषासुरेन्द्र अर्द्धोन्नतं भाति तथैव तस्याः। सृष्ट्वा विधाता हि निरूपणाय श्रान्तस्तथा हस्ततले ददौ हि ॥ १२ जङ्घे सुवृत्तेऽपि च रोमहीने शोभेत दैत्येश्वर ते तदीये। आक्रम्य लोकानिव निर्मिताया रूपार्जितस्यैव कृताधरौ हि ॥ १३ पादौ च तस्याः कमलोदराभौ प्रयत्नतस्तौ हि कृतौ विधात्रा। आभ्राजि ताभ्यां नखरत्नमाला नक्षत्रमाला गगने यथैव ॥ १४ दुर्गोंकी रचना की है। शस्त्रसहित उसकी मोटी परिघके समान अठारह भुजाएँ इस प्रकार सुशोभित हो रही हैं, मानो आपका पराक्रम जानकर कामदेवने यन्त्रके समान उसका निर्माण किया है। दैत्येन्द्र ! त्रिवलीसे तरङ्गायमान उसकी कमर इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो वह भयार्त तथा अधीर कामदेवका आरोहण करनेके लिये सोपान हो। असुर! उसके पीन कुचोंतककी वह रोमावलि इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो आरोहण करनेमें आपके भयसे कातर कामदेवका स्वेद-प्रवाह हो' ॥ ५-८॥ 'उसकी गम्भीर दक्षिणावर्त नाभि ऐसी लगती है, मानो कंदर्पने स्वयं ही उस सौन्दर्यगृहके ऊपर मुहर लगा दी है। मेखलासे चारों ओर आवेष्टित उस मृगनयनीका जघन बड़ा सुन्दर सुशोभित हो रहा है। उसे हम राजा कामका प्राकारसे (चहारदीवारियोंसे) गुप्त (सुरक्षित) दुर्गम नगर मानते हैं। उस कुमारीके वृत्ताकार रोमरहित, कोमल तथा उत्तम ऊरु इस प्रकार शोभित हो रहे हैं, मानो कामदेवने मनुष्योंके निवासके लिये दो रेखाओंका संनिवेश किया है। महिषासुरेन्द्र! उसके अर्द्धोन्नत जानुयुगल इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, मानो उसकी रचना करनेके बाद थके विधाताने निरूपण करनेके लिये अपना करतल ही स्थापित कर दिया हो' ॥ ९-१२॥ 'दैत्येश्वर! उसकी सुवृत्त तथा रोमहीन दोनों जंघाएँ इस प्रकार सुशोभित हो रही हैं, मानो (दिव्य) निर्मित की गयी नायिकाके रूपके द्वारा सभी लोग पराजित कर दिये गये हैं। विधाताने प्रयत्नपूर्वक उसके कमलोदरके समान कान्तिवाले दोनों पैरोंका निर्माण किया है। उन्होंने कात्यायनीके उन चरणोंके नखरूपी रत्नशृङ्खलाको इस प्रकार प्रकाशित किया है, मानो वह आकाशमें नक्षत्रोंकी माला हो।