भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय १९] चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन और युद्धोपक्रम १०३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तथोक्तवाक्ये दितिजः शिवाया-<br>स्त्यज्याम्बरं भूमितले निषण्णः।<br>सुखोपविष्टः परमासने च<br>रम्भात्मजेनोक्तमुवाच वाक्यम्॥ २४दुर्गाके इस प्रकार कहनेपर वह दैत्य आकाशसे उतरकर पृथ्वीपर आया और सुन्दर आसनपर सुखपूर्वक बैठकर महिषके वचनोंको इस प्रकार कहने लगा—॥ २१—२४॥
दुन्दुभिरुवाच<br>एवं समाज्ञापयते सुरारि-<br>स्त्वां देवि दैत्यो महिषासुरस्तु।<br>यथामरा हीनबलाः पृथिव्यां<br>भ्रमन्ति युद्धे विजिता मया ते॥ २५<br>स्वर्गं मही वायुपथाश्च वश्याः<br>पातालमन्ये च महेश्वराद्याः।<br>इन्द्रोऽस्मि रुद्रोऽस्मि दिवाकरोऽस्मि<br>सर्वेषु लोकेष्वधिपोऽस्मि बाले॥ २६<br>न सोऽस्ति नाके न महीतले वा<br>रसातले देवभटोऽसुरो वा।<br>यो मां हि संग्राममुपेयिवांस्तु<br>भूतो न यक्षो न जिजीविषुर्यः॥ २७<br>यान्येव रत्नानि महीतले वा<br>स्वर्गेऽपि पातालतलेऽथ मुग्धे।<br>सर्वाणि मामद्य समागतानि<br>वीर्यार्जितानीह विशालनेत्रे॥ २८<br>स्त्रीरत्नमग्र्यं भवती च कन्या<br>प्राप्तोऽस्मि शैलं तव कारणेन।<br>तस्माद् भजस्वेह जगत्पतिं मां<br>पतिस्तवार्होऽस्मि विभुः प्रभुश्च॥ २९दुन्दुभि बोला— देवि! असुर महिषने तुम्हें यह अवगत कराया है कि मेरे द्वारा युद्धमें पराजित हुए निर्बल देवतालोग पृथ्वीपर भ्रमण कर रहे हैं। हे बाले! स्वर्ग, पृथ्वी, वायुमार्ग, पाताल और शङ्कर आदि देवगण सभी मेरे वशमें हैं। मैं ही इन्द्र, रुद्र एवं सूर्य हूँ तथा सभी लोकोंका स्वामी हूँ। स्वर्ग, पृथ्वी या रसातलमें जीवित रहनेकी इच्छावाला ऐसा कोई देव, असुर, भूत या यक्ष योद्धा नहीं हुआ, जो युद्धमें मेरे सामने आ सकता हो। (और भी सुनो) पृथ्वी, स्वर्ग या पातालमें जितने भी रत्न हैं, उन सबको मैंने अपने पराक्रमसे जीत लिया है और अब वे मेरे पास आ गये हैं। अतः अबोध बालिके! तुम कन्या हो और स्त्रीरत्नोंमें श्रेष्ठ हो। मैं तुम्हारे लिये इस पर्वतपर आया हूँ। इसलिये मुझ जगत्पतिको तुम स्वीकार करो। मैं तुम्हारे योग्य सर्वथा समर्थ पति हूँ॥ २५—२९॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ता दितिजेन दुर्गा<br>कात्यायनी प्राह मयस्य पुत्रम्।<br>सत्यं प्रभुर्दानवराट् पृथिव्यां<br>सत्यं च युद्धे विजितामराश्च॥ ३०<br>किं त्वस्ति दैत्येश कुलेऽस्मदीये<br>धर्मो हि शुल्काख्य इति प्रसिद्धः।<br>तं चेत् प्रद्यान्महिषो ममाद्य<br>भजामि सत्येन पतिं हयारिम्॥ ३१<br>श्रुत्वाऽथ वाक्यं मयजोऽब्रवीच्च<br>शुल्कं वदस्वाम्बुजपत्रनेत्रे।<br>दद्यात्स्वमूर्धानमपि त्वदर्थे<br>किं नाम शुल्कं यदिहैव लभ्यम्॥ ३२पुलस्त्यजीने कहा— उस दैत्यके ऐसा कहनेपर दुर्गाजीने दुन्दुभिसे कहा—(असुरदूत!) यह सत्य है कि दानवराट् महिष पृथ्वीमें समर्थ है एवं यह भी सत्य है कि उसने युद्धमें देवताओंको जीत लिया है; किंतु दैत्येश! हमारे कुलमें (विवाहके विषयमें) शुल्क नामकी एक प्रथा प्रचलित है। यदि महिष आज मुझे वह प्रदान करे तो सत्यरूपमें (सचमुच) मैं उस (महिष)-को पतिरूपमें स्वीकार कर लूँगी। इस वाक्यको सुनकर दुन्दुभिने कहा—(अच्छा) कमलपत्राक्षि! तुम वह शुल्क बतलाओ। महिष तो तुम्हारे लिये अपना सिर भी प्रदान कर सकता है; शुल्ककी तो बात ही क्या, जो यहाँ ही मिल सकता है॥ ३०—३२॥