वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ ततो मृगयाव्याक्षेपाद् एकाकी विजनं वनम्। वैभ्राजं स जगामाथ अथोन्मादनमभ्ययात्॥ ३० ततस्तु कौतुकाविष्टः सर्वर्तुकुसुमे वने। अवितृप्तः सुगन्धस्य समन्ताद् व्यचरद् वनम्॥ ३१ स वनान्तं च ददृशे फुल्लकोकनदावृतम्। कह्लारपद्मकुमुदैः कमलेन्दीवरैरपि॥ ३२ तत्र क्रीडन्ति सततमप्सरोऽमरकन्यकाः। तासां मध्ये ददर्शाथ कन्यां संवरणोऽधिकाम्॥ ३३ दर्शनादेव स नृपः काममार्गणपीडितः। जातः सा च समीक्ष्यैव कामबाणातुरोऽभवत्॥ ३४ उभौ तौ पीडितौ मोहं जग्मतुः काममार्गणैः। राजा चलासनो भूम्यां निपपात तुरंगमात्॥ ३५ तमभ्येत्य महात्मानो गन्धर्वाः कामरूपिणः। सिषिचुर्वारिणाऽभ्येत्य लब्धसंज्ञोऽभवत् क्षणात्॥ ३६ सा चाप्सरोभिरुत्थात्य नीता पितृकुलं निजम्। ताभिराश्वासिता चापि मधुरैर्वचनाम्बुभिः॥ ३७ स चाप्यारुह्य तुरगं प्रतिष्ठानं पुरोत्तमम्। गतस्तु मेरुशिखरं कामचारी यथाऽमरः॥ ३८ यदाप्रभृति सा दृष्टा आर्क्षिणा तपती गिरौ। तदाप्रभृति नाश्नाति दिवा स्वपिति नो निशि॥ ३९ ततः सर्वविदव्यग्रो विदित्वा वरुणात्मजः। तपंतीतापितं वीरं पार्थिवं तपसां निधिः॥ ४० समुत्पत्य महायोगी गगनं रविमण्डलम्। विवेश देवं तिग्मांशं ददर्श स्यन्दने स्थितम्॥ ४१ तं दृष्ट्वा भास्करं देवं प्रणमद् द्विजसत्तमः। प्रतिप्रणमितश्चासौ भास्करेणाविशद् रथे॥ ४२ ज्वलज्जटाकलापोऽसौ दिवाकरसमीपगः। शोभते वारुणिः श्रीमान् द्वितीय इव भास्करः॥ ४३ फिर शिकारके लिये व्याक्षिप्त (व्यग्र) वह अकेला ही वैभ्राज नामक निर्जन वनमें पहुँचा। उसके बाद वह उन्मादसे ग्रस्त हो गया। उस वनमें सभी ऋतुओंमें फूल फूलते रहते थे, सुगन्ध भी रहती थी, फिर भी उससे संतुप्त न होनेके कारण वह कुतूहलवश वनमें चारों ओर विचरण करने लगा। वहाँ उसने फूले हुए श्वेत, लाल, पीले कमल, कुमुद एवं नीले कमलोंसे भरे उस वनको देखा। अप्सराएँ एवं देवकन्याएँ वहाँ सदा मनोरञ्जन (मनबहलाव) किया करती थीं। संवरणने उनके बीच एक अत्यन्त सुन्दरी कन्याको देखा॥ ३०-३३॥ उसे देखते ही वह राजा कामदेवके बाणसे पीड़ित (कामसे आशित) हो गया और इसी प्रकार वह कन्या भी उसे देखकर कामबाणसे अधीर (मोहित) हो गयी। कामके बाणोंसे विवश होकर वे दोनों अचेत-से हो गये। राजा घोड़ेकी पीठपर रखे हुए आसनसे खिसककर पृथ्वीपर गिर पड़ा और इच्छाके अनुसार अपना रूप बना लेनेवाले महात्मा गन्धर्वलोग उसके पास जाकर उसे जलसे सींचने लगे। (फिर) वह दूसरे ही क्षण चेतनामें आ गया। तब अप्सराओंने उसे मधुर वचनरूपी जलसे भी आश्वस्त किया और उसे उठाकर उसके पिताके घर ले गयीं॥ ३४-३७॥ फिर वह राजा (अपने) घोड़ेपर चढ़कर (अपने) श्रेष्ठ पैठण नगर इस प्रकार चला गया, जैसे कोई इच्छाके अनुसार चलनेवाला देवता (सरलतासे) मेरुशृङ्गपर चला जाय। ऋक्षके पुत्र संवरणने पर्वतपर देवकन्या तपतीको जबसे अपनी आँखोंसे देखा था, तबसे वह दिनमें न तो भोजन करता था और न रात्रिमें सोता ही था। फिर सब कुछ जाननेवाले एवं शान्त तथा तपस्याके निधिस्वरूप वरुणके पुत्र महायोगी वसिष्ठ उस वीर राजपुत्रको तपतीके कारण संतापमें पड़े देखकर आकाशमें ऊपर जाकर (मध्य आकाशमें स्थित) सूर्यमण्डलमें प्रवेश किया तथा वहाँ रथपर बैठे हुए तेज किरणवाले सूर्यदेवका उसने दर्शन किया॥ ३८-४१॥ द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठने सूर्यदेवको देखकर प्रणाम किया। फिर वे सूर्यके द्वारा प्रत्यभिवादन (प्रणामके बदले प्रणाम) किये जानेपर उनके समीप जाकर रथमें बैठ गये। सूर्यदेवके पास रथपर बैठे हुए अग्नि-शिखाके समान चमचमाती जटावाले वरुणके पुत्र वसिष्ठ दूसरे