वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ें| १५० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ३२ |
|---|
| त्रयो गुणास्त्रयो वर्णास्त्रयो देवास्तथा क्रमात्।<br>त्रैधातवस्तथावस्थाः पितरश्चैवमादयः॥ ११<br><br>एतन्मात्रात्रयं देवि तव रूपं सरस्वति।<br>विभिन्नदर्शनामाद्यां ब्रह्मणो हि सनातनीम्॥ १२ | वर्ग; सत्त्व, रज, तम —ये तीनों गुण; ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य—ये तीनों वर्ण; तीनों देव; वात, पित्त, कफ—ये तीनों धातुएँ तथा जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—ये तीनों अवस्थाएँ एवं पिता, पितामह, प्रपितामह—ये तीनों पितर इत्यादि—ये सभी ओंकारके मात्रात्रयस्वरूप आपके रूप हैं। आपको ब्रह्मकी विभिन्न रूपोंवाली आद्या एवं सनातनी मूर्ति कहा जाता है॥ ८—१२॥ | | सोमसंस्था हविःसंस्था पाकसंस्था सनातनी।<br>तास्त्वदुच्चारणाद् देवि क्रियन्ते ब्रह्मवादिभिः॥ १३<br><br>अनिर्देश्यपदं त्वेतदर्द्धमात्राश्रितं परम्।<br>अविकार्यक्षयं दिव्यं परिणामविवर्जितम्॥ १४<br><br>तवैतत् परमं रूपं यन्न शक्यं मयोदितुम्।<br>न चास्येन न वा जिह्वाताल्वोष्ठादिभिरुच्यते॥ १५<br><br>स विष्णुः स वृषो ब्रह्मा चन्द्रार्कज्योतिरेव च।<br>विश्वावासं विश्वरूपं विश्वात्मानमनीश्वरम्॥ १६ | देवि! ब्रह्मवादी लोग आपकी शक्तिसे ही उच्चारण करके सोमसंस्था, हविःसंस्था एवं सनातनी पाकसंस्थाको सम्पन्न करते हैं। अर्धमात्रामें आश्रित आपका यह अनिर्देश्य पद अविकारी, अक्षय, दिव्य तथा अपरिणामी है। यह आपका अनिर्देश्य पद परम रूप है, जिसका वर्णन मैं नहीं कर सकता। न तो मुखसे ही इसका वर्णन हो सकता है और न जिह्वा, तालु, ओष्ठ आदिसे ही। तुम्हारा वह रूप ही विष्णु, वृष (धर्म), ब्रह्मा, चन्द्रमा, सूर्य एवं ज्योति है। उसीको विश्वावास, विश्वरूप, विश्वात्मा एवं अनीश्वर (स्वतन्त्र) कहते हैं॥ १३—१६॥ | | सांख्यसिद्धान्तवेदोक्तं बहुशाखास्थिरीकृतम्।<br>अनादिमध्यनिधनं सदसच्च सदैव तु॥ १७<br><br>एकं त्वनेकधाप्येकभाववेदसमाश्रितम्।<br>अनाख्यं षड्गुणाख्यं च बह्वाख्यं त्रिगुणाश्रयम्॥ १८<br><br>नानाशक्तिविभावज्ञं नानाशक्तिविभावकम्।<br>सुखात् सुखं महत्सौख्यं रूपं तत्त्वगुणात्मकम्॥ १९<br><br>एवं देवि त्वया व्याप्तं सकलं निष्कलं च यत्।<br>अद्वैतावस्थितं ब्रह्म यच्च द्वैते व्यवस्थितम्॥ २० | आपका यह रूप सांख्य-सिद्धान्त तथा वेदद्वारा वर्णित, (वेदोंकी) बहुत-सी शाखाओंद्धारा स्थिर किया हुआ, आदि-मध्य-अन्तसे रहित, सत्-असत् अथवा एकमात्र सत् (ही) है। यह एक तथा अनेक प्रकारका, वेदोंद्वारा एकाग्र भक्तिसे अवलम्बित, आख्या (नाम)-विहीन, ऐश्वर्य आदि षड्गुणोंसे युक्त, बहुत नामोंवाला तथा त्रिगुणाश्रय है। आपका यह तत्त्वगुणात्मक रूप सुखसे भी परम सुख, महान् सुखरूप नाना शक्तियोंके विभावको जाननेवाला है। हे देवि! वह अद्वैत तथा द्वैतमें आश्रित ‘निष्कलं’ तथा ‘सकल ब्रह्म’ आपके द्वारा व्याप्त है॥ १७—२०॥ | | येऽर्था नित्या ये विनश्यन्ति चान्ये<br>येऽर्थाः स्थूला ये तथा सन्ति सूक्ष्माः।<br>ये वा भूमौ येऽन्तरिक्षेऽन्यतो वा<br>तेषां देवि त्वत्त एवोपलब्धिः॥ २१<br><br>यद्वा मूर्तं यदमूर्तं समस्तं<br>यद्वा भूतेष्वेकमेकं च किंचित्।<br>यच्च द्वैते व्यस्तभूतं च लक्ष्यं<br>तत्सम्बद्धं त्वत्स्वरैर्व्यञ्जनैश्च॥ २२ | (सरस्वती) देवि! जो पदार्थ नित्य हैं तथा जो विनष्ट हो जानेवाले हैं, जो पदार्थ स्थूल हैं तथा जो सूक्ष्म हैं, जो भूमिपर हैं तथा जो अन्तरिक्षमें हैं या जो इनसे भिन्न स्थानोंमें हैं, उन समस्त पदार्थोंकी प्राप्ति आपसे ही होती है। जो मूर्त या अमूर्त है वह सब कुछ और जो सब भूतोंमें एक रूपसे स्थित है एवं केवल एकमात्र है और जो द्वैतमें अलग-अलग रूपसे दिखलायी पड़ता है, वह सब कुछ आपके स्वर-व्यञ्जनोंसे सम्बद्ध है। |