वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ३५ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन [ १५७
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| वरं वृणीष्व भद्रं ते किमिच्छसि महायशः।<br>एवमुक्तस्तु पितृभी रामः प्रभवतां वरः॥ ५<br>अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं स पितॄन् गगने स्थितान्।<br>भवन्तो यदि मे प्रीता यद्यनुग्राह्यता मयि॥ ६<br>पितृप्रसादादिच्छेयं तपसाप्यायनं पुनः।<br>यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मया॥ ७<br>ततश्च पापान्मुच्येयं युष्माकं तेजसा ह्यहम्।<br>ह्रदाश्चैते तीर्थभूता भवेयुर्भुवि विश्रुताः॥ ८ | महायशस्विन्! तुम्हारा कल्याण हो। तुम वर माँगो। क्या चाहते हो? पितरोंके इस प्रकार कहनेपर प्रभावशालियोंमें श्रेष्ठ रामने आकाशमें स्थित पितरोंसे हाथ जोड़कर कहा—यदि आपलोग मेरे ऊपर प्रसन्न हैं तथा मुझपर आप सबकी दया है तो आप पितरोंके प्रसादसे मैं पुनः तपसे पूर्ण हो जाऊँ। रोषसे अभिभूत होकर मैंने जो क्षत्रियोंका विनाश किया है, आपके तेजद्वारा मैं उस पापसे मुक्त हो जाऊँ एवं ये कुण्ड संसारमें विख्यात तीर्थस्वरूप हो जायँ॥ ५—८॥ |
| एवमुक्ताः शुभं वाक्यं रामस्य पितरस्तदा।<br>प्रत्यूचुः परमप्रीता रामं हर्षपुरस्कृताः॥ ९<br>तपस्ते वर्द्धतां पुत्र पितृभक्त्या विशेषतः।<br>यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं त्वया॥ १०<br>ततश्च पापान्मुक्तस्त्वं पातितास्ते स्वकर्मभिः।<br>ह्रदाश्च तव तीर्थत्वं गमिष्यन्ति न संशयः॥ ११<br>ह्रदेष्वेतेषु ये स्नात्वा स्वान् पितॄंस्तर्पयन्ति च।<br>तेभ्यो दास्यन्ति पितरो यथाभिलषितं वरम्॥ १२<br>ईप्सितान् मानसान् कामान् स्वर्गवासं च शाश्वतम्।<br>एवं दत्त्वा वरान् विप्रा रामस्य पितरस्तदा॥ १३<br>आमन्त्र्य भार्गवं प्रीतास्तत्रैवान्तर्हितास्तदा।<br>एवं रामह्रदाः पुण्या भार्गवस्य महात्मनः॥ १४ | परशुरामके इस प्रकारके मङ्गलमय वचन कहनेपर उनके परम प्रसन्न पितरोंने हर्षपूर्वक उनसे कहा—'पुत्र! पितृभक्तिसे तुम्हारा तप विशेषरूपसे बढ़े। क्रोधसे अभिभूत होनेके कारण तुमने क्षत्रियोंका जो विनाश किया है उस पापसे तुम मुक्त हो; क्योंकि ये क्षत्रिय अपने कर्मसे ही मारे गये हैं। तुम्हारे ये कुण्ड निःसंदेह तीर्थके गुणोंको प्राप्त करेंगे। जो इन कुण्डोंमें स्नान कर अपने पितरोंका तर्पण करेंगे, उन्हें (उनके) पितृगण मनकी इच्छाके अनुसार वर देंगे, उनकी मनोऽभिलषित कामनाएँ पूर्ण करेंगे एवं उन्हें स्वर्गमें शाश्वत निवास प्रदान करेंगे।' विप्रो! इस प्रकार वर देकर परशुरामके पितर उनसे अनुमति लेकर प्रसन्नतापूर्वक वहीं अन्तर्हित हो गये। इस प्रकार महात्मा परशुरामके ये रामह्रद परम पवित्र हैं॥ ९—१४॥ |
| स्नात्वा ह्रदेषु रामस्य ब्रह्मचारी शुचिव्रतः।<br>राममभ्यर्च्य श्रद्धावान् विन्देद् बहु सुवर्णकम्॥ १५<br><br>वंशमूलं समासाद्य तीर्थसेवी सुसंयतः।<br>स्ववंशसिद्धये विप्राः स्नात्वा वै वंशमूलके॥ १६<br><br>कायशोधनमासाद्य तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्।<br>शरीरशुद्धिमाप्नोति स्नातस्तस्मिन् न संशयः॥ १७<br><br>शुद्धदेहश्च तं याति यस्मान्नावर्तते पुनः।<br>तावद् भ्रमन्ति तीर्थेषु सिद्धास्तीर्थपरायणाः।<br>यावन्न प्राप्नुवन्तीह तीर्थं तत्कायशोधनम्॥ १८ | श्रद्धालु पवित्रकर्मा व्यक्ति ब्रह्मचर्यपूर्वक परशुरामजीके ह्रदोंमें स्नान करनेके बाद परशुरामका अर्चन कर प्रचुर सुवर्ण प्राप्त करता है। ब्राह्मणो! तीर्थसेवी जितेन्द्रिय मनुष्य वंशमूलक नामक तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेसे अपने वंशकी सिद्धि प्राप्त करता है। तीनों लोकोंमें विख्यात कायशोधन नामक तीर्थमें जाकर उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको निस्संदेह शरीरकी शुद्धि प्राप्त होती है और वह शुद्धदेही मनुष्य उस स्थानको जाता है, जहाँसे वह पुनः नहीं लौटता (जन्म-मरणके चक्करमें नहीं पड़ता)। तीर्थपरायण सिद्ध पुरुष तीर्थोंमें तबतक भ्रमण करते रहते हैं, जबतक वे उस कायशोधन नामक तीर्थमें नहीं पहुँचते॥ १५—१८॥ |