वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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| अध्याय ३५ ] | कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका वर्णन | १५९ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तस्मिन् विवरद्वारे तु स्थितो गणपतिः स्वयं।<br>यं दृष्ट्वा सकलान् कामान् प्राप्नोति संयतेन्द्रियः॥ २३ | भटकने लगीं। उस विवरके द्वारपर स्वयं गणपति भगवान् स्थित हैं। जितेन्द्रिय मनुष्य उनका दर्शन करके समस्त कामनाओंको प्राप्त करता है। |
| सङ्गिनीं तु समासाद्य तीर्थं मुक्तिसमाश्रयम्।<br>देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा लभते रूपमुत्तमम्॥ ३४<br><br>अनन्तां श्रियमाप्नोति पुत्रपौत्रसमन्वितः।<br>भोगांश्च विपुलान् भुक्त्वा प्राप्नोति परमं पदम्॥ ३५ | मुक्तिके आश्रयस्वरूप देवीके संगिनीतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्यको सुन्दर रूपकी प्राप्ति होती है तथा वह स्नानकर्ता पुरुष पुत्र-पौत्रसमन्वित होकर अनन्त ऐश्वर्यको प्राप्त करता है और विपुल भोगोंका उपभोग कर परम पदको प्राप्त करता है॥ ३२-३५॥ |
| ब्रह्मावर्त्ते नरः स्नात्वा ब्रह्मज्ञानसमन्वितः।<br>भवते नात्र संदेहः प्राणान् मुञ्चति स्वेच्छया॥ ३६<br><br>ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा द्वारपालं तु रन्तुकम्।<br>तस्य तीर्थं सरस्वत्यां यक्षेन्द्रस्य महात्मनः॥ ३७<br><br>तत्र स्नात्वा महाप्राज्ञ उपवासपरायणः।<br>यक्षस्य च प्रसादेन लभते कामिकं फलम्॥ ३८<br><br>ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा ब्रह्मावर्त्तं मुनिस्तुतम्।<br>ब्रह्मावर्त्ते नरः स्नात्वा ब्रह्म चाप्नोति निश्चितम्॥ ३९ | ब्रह्मावर्त नामक तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य निःसंदेह ब्रह्मज्ञानी हो जाता है एवं वह निज इच्छाके अनुसार अपने प्राणोंका परित्याग करता है। हे विप्रश्रेष्ठो ! संगिनीतीर्थके बाद द्वारपाल रन्तुकके तीर्थमें जाय। उन महात्मा यक्षेन्द्रका तीर्थ सरस्वती नदीमें है। वहाँ स्नान करके उपवास-व्रतमें निरत परमज्ञानी व्यक्ति यक्षके प्रसादसे इच्छित फल प्राप्त करता है। हे विप्रवरो ! फिर मुनियोंद्वारा प्रशंसा-प्राप्त ब्रह्मावर्त्त तीर्थमें जाना चाहिये। ब्रह्मावर्त्तमें स्नान करनेसे मनुष्य निश्चय ही ब्रह्मको प्राप्त करता है॥ ३६-३९॥ |
| ततो गच्छेत विप्रेन्द्राः सुतीर्थकमनुत्तमम्।<br>तत्र संनिहिता नित्यं पितरो दैवतैः सह॥ ४०<br><br>तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः।<br>अश्वमेधमवाप्नोति पितॄन् प्रीणाति शाश्वतान्॥ ४१<br><br>ततोऽम्बुवनं धर्मज्ञ समासाद्य यथाक्रमम्।<br>कामेश्वरस्य तीर्थं तु स्नात्वा श्रद्धासमन्वितः॥ ४२<br><br>सर्वव्याधिविनिर्मुक्तो ब्रह्मावाप्तिर्भवेद् ध्रुवम्।<br>मातृतीर्थं च तत्रैव यत्र स्नातस्य भक्तितः॥ ४३<br><br>प्रजा विवर्द्धते नित्यमनन्तां चाप्नुयाच्छ्रियम्।<br>ततः शीतवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः॥ ४४<br><br>तीर्थं तत्र महाविप्रा महदन्यत्र दुर्लभम्।<br>पुनाति दर्शनादेव दण्डकं च द्विजोत्तमाः॥ ४५ | हे विप्रश्रेष्ठो ! उसके बाद श्रेष्ठ सुतीर्थक नामके स्थानपर जाना चाहिये। उस स्थानमें देवताओंके साथ पितृगण नित्य स्थित रहते हैं। पितरों एवं देवोंकी अर्चनामें लगा रहनेवाला व्यक्ति वहाँ स्नानकर अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है तथा शाश्वत पितरोंको प्रसन्न करता है। धर्मज्ञ! उसके बाद क्रमानुसार कामेश्वर तीर्थके अम्बुवनमें जाकर श्रद्धापूर्वक स्नान करनेसे मनुष्य सभी व्याधियोंसे छूटकर निश्चय ही ब्रह्मकी प्राप्ति करता है। उसी स्थानमें स्थित मातृतीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान करनेसे मनुष्यकी प्रजा (संतति)-की नित्य वृद्धि होती है तथा उसे अनन्त लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। उसके बाद नियत आहार करनेवाला एवं जितेन्द्रिय व्यक्ति शीतवन नामक तीर्थमें जाय। हे महाविप्रो! वहाँ दण्डक नामक एक महान् तीर्थ है; वह अत्यन्त दुर्लभ है। द्विजोत्तमो ! वह दण्डक नामका महान् तीर्थ दर्शनमात्रसे मनुष्यको पवित्र कर देता है॥ ४०-४५॥ |
| केशानभ्युक्ष्य वै तस्मिन् पूतो भवति पापतः।<br>तत्र तीर्थवरं चान्यत् स्वानुलोमायनं महत्॥ ४६<br><br>तत्र विप्रा महाप्राज्ञा विद्वांसस्तीर्थतत्पराः।<br>स्वानुलोमायने तीर्थे विप्रास्त्रैलोक्यविश्रुते॥ ४७ | उस तीर्थमें केशोंका मुण्डन करानेसे मनुष्य अपने पापोंसे मुक्त हो जाता है। वहाँ स्वानुलोमायन नामका एक दूसरा महान् तीर्थ है। हे द्विजोत्तमो ! वहाँ तीर्थ-सेवन करनेमें तत्पर परमज्ञानी विद्वान् लोग रहते हैं। त्रिलोकविख्यात |