वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ३६ ] कुरुक्षेत्रके तीर्थोंके माहात्म्य एवं क्रमका अनुक्रान्त वर्णन १६१ य आपगां नदीं गत्वा तिलैः संतर्पयिष्यति । तेन तृप्ता भविष्यामो यावत्कल्पशतं गतम् ॥ ५ नभस्ये मासि सम्प्राप्ते कृष्णपक्षे विशेषतः । चतुर्दश्यां तु मध्याह्ने पिण्डदो मुक्तिमाप्नुयात् ॥ ६ ततो गच्छेत विप्रेन्द्रा ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् । ब्रह्मोदुम्बरमित्येवं सर्वलोकेषु विश्रुतम् ॥ ७ तत्र ब्रह्मर्षिकुण्डेषु स्नातस्य द्विजसत्तमाः । सप्तर्षीणां प्रसादेन सप्तसोमफलं भवेत् ॥ ८ भरद्वाजो गौतमश्च जगदग्निश्च कश्यपः । विश्वामित्रो वसिष्ठश्च अत्रिश्च भगवानृषिः ॥ ९ एतैः समेत्य तत्कुण्डं कल्पितं भुवि दुर्लभम् । ब्रह्मणा सेवितं यस्माद् ब्रह्मोदुम्बरमुच्यते ॥ १० तस्मिंस्तीर्थवरे स्नातो ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । ब्रह्मलोकमवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥ ११ देवान् पितॄन् समुद्दिश्य यो विप्रं भोजयिष्यति । पितरस्तस्य सुखिता दास्यन्ति भुवि दुर्लभम् ॥ १२ सप्तर्षींश्च समुद्दिश्य पृथक् स्नानं समाचरेत् । ऋणीणां च प्रसादेन सप्तलोकाधिपो भवेत् ॥ १३ कपिस्यलेति विख्यातं सर्वपातकनाशनम् । यस्मिन् स्थितः स्वयं देवो वृद्धकेदारसंज्ञितः ॥ १४ तत्र स्नात्वाऽर्चयित्वा च रुद्रं दिण्डिसमन्वितम् । अन्तर्धानमवाप्नोति शिवलोके स मोदते ॥ १५ यस्तत्र तर्पणं कृत्वा पिबते चुलकत्रयम् । दिण्डिदेवं नमस्कृत्य केदारस्य फलं लभेत् ॥ १६ यस्तत्र कुरुते श्राद्धं शिवमुद्दिश्य मानवः । चैत्रशुक्लचतुर्दश्यां प्राप्नोति परमं पदम् ॥ १७ कलस्यां तु ततो गच्छेद यत्र देवी स्वयं स्थिता । दुर्गा कात्यायनी भद्रा निद्रा माया सनातनी ॥ १८ कलस्यां च नरः स्नात्वा दृष्ट्वा दुर्गां तटे स्थिताम् । संसारगहनं दुर्गं निस्तरेन्नात्र संशयः ॥ १९ ऐसा पुत्र या पौत्र उत्पन्न होगा, जो आपगा नदीके तटपर जाकर तिलसे तर्पण करेगा, जिससे हम सभी सैकड़ों कल्पतक (अनन्त कालतक) तृप्त रहेंगे ॥ १-५ ॥ भाद्रपदके महीनेमें, विशेषकर कृष्णपक्षमें, चतुर्दशी तिथिको मध्याह्न कालमें पिण्डदान करनेवाला मनुष्य मुक्ति प्राप्त करता है। विप्रवरो ! उसके बाद समस्त लोकोंमें 'ब्रह्मोदुम्बर' नामसे प्रसिद्ध ब्रह्माके श्रेष्ठ स्थानमें जाना चाहिये। द्विजवरो ! वहाँ ब्रह्मर्षिकुण्डमें स्नान करनेवाले व्यक्तिको सप्तर्षियोंकी कृपासे सात सोमयज्ञोंका फल प्राप्त होता है। भरद्वाज, गौतम, जमदग्नि, कश्यप, विश्वामित्र, वसिष्ठ एवं भगवान् अत्रि (-इन सात) ऋषियोंने मिलकर पृथ्वीमें दुर्लभ इस कुण्डको बनाया था। ब्रह्माद्वारा सेवित होनेके कारण यह स्थान 'ब्रह्मोदुम्बर' कहलाता है ॥ ६-१० ॥ अव्यक्त जन्मवाले ब्रह्माके उस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है- इसमें कोई संदेहकी बात नहीं है। जो मनुष्य वहाँ देवताओं और पितरोंके उद्देश्यसे ब्राह्मणोंको भोजन करायेगा, उसके पितर सुखी होकर उसे संसारमें दुर्लभ वस्तु प्रदान करेंगे। सात ऋषियोंके उद्देश्यसे जो (व्यक्ति) अलगसे स्नान करेगा, वह ऋषियोंके अनुग्रहसे सात लोकोंका स्वामी होगा। वहाँ सभी पापोंका विनाश करनेवाला विख्यात कपिस्थल नामक तीर्थ है, जहाँ वृद्धकेदार नामके देव स्वयं विद्यमान हैं। वहाँ स्नान करनेके बाद दिण्डिके साथ रुद्रदेवका अर्चन करनेसे मनुष्यको अन्तर्धानकी शक्ति प्राप्त होती है और वह शिवलोकमें आनन्द प्राप्त करता है ॥ ११-१५ ॥ जो व्यक्ति उस स्थानपर तर्पण करके दिण्डि भगवान्को प्रणाम कर तीन चुल्लू जल पीता है, वह केदार्तीर्थमें जानेका फल प्राप्त करता है। जो व्यक्ति वहाँ शिवजीके उद्देश्यसे चैत्र शुक्ला चतुर्दशी तिथिमें श्राद्ध करता है, वह परम पद (मोक्ष) -को प्राप्त कर लेता है। उसके बाद कलसी नामके तीर्थमें जाना चाहिये जहाँ भद्रा, निद्रा, माया, सनातनी, कात्यायनीरूपा दुर्गादेवी स्वयं अवस्थित हैं। कलसी तीर्थमें स्नानकर उसके तीरपर स्थित दुर्गादेवीका दर्शन करनेवाला मनुष्य दुस्तर संसार- दुर्ग (सांसारिक भवबन्धन) -को पार कर जाता है। इसमें (तनिक भी) संदेह नहीं करना चाहिये ॥ १६-१९ ॥