भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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१८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ४३ इत्युक्तस्तापसीभिस्तु प्रोवाच हसिताननः । इदमीदृग् व्रतं किंचिन्न रहस्यं प्रकाश्यते ॥ ६२ शृण्वन्ति बहवो यत्र तत्र व्याख्या न विद्यते । अस्य व्रतस्य सुभगा इति मत्वा गमिष्यथ ॥ ६३ एवमुक्तास्तदा तेन ताः प्रत्यूचुस्तदा मुनिम् । रहस्ये हि गमिष्यामो मुने नः कौतुकं महत् ॥ ६४ इत्युक्त्वा तास्तदा तं वै जगृहुः पाणिपल्लवैः । काचित् कण्ठे सकन्दर्पा बाहुभ्यामपरास्तथा ॥ ६५ जानुभ्यामपरा नार्यः केशेषु ललितापराः । अपरास्तु कटीरन्धे अपराः पादयोरपि ॥ ६६ क्षोभं विलोक्य मुनय आश्रमेषु स्वयोषिताम् । हन्यतामिति संभाष्य काष्ठपाषाणपाणयः ॥ ६७ पातयन्ति स्म देवस्य लिङ्गमुद्धृत्य भीषणम् । पतिते तु ततो लिङ्गे गतोऽन्तर्धानमीश्वरः ॥ ६८ देव्या स भगवान् रुद्रः कैलासं नगमाश्रितः । पतिते देवदेवस्य लिङ्गे नष्टे चराचरे ॥ ६९ क्षोभो बभूव सुमहानृषीणां भावितात्मनाम् । एवं देवे तदा तत्र वर्तति व्याकुलीकृते ॥ ७० उवाचैको मुनिवरस्तत्र बुद्धिमतां वरः । न वयं विद्मः सद्भावं तापसस्य महात्मनः ॥ ७१ विरिञ्चिं शरणं यामः स हि ज्ञास्यति चेष्टितम् । एवमुक्ताः सर्व एव ऋषयो लज्जिता भृशम् ॥ ७२ ब्रह्मणः सदनं जग्मुर्देवैः सह निषेवितम् । प्रणिपत्याथ देवेशं लज्जयाऽधोमुखाः स्थिताः ॥ ७३ अथ तान् दुःखितान् दृष्ट्वा ब्रह्मा वचनमब्रवीत् । अहो मुग्धा यदा यूयं क्रोधेन कलुषीकृताः ॥ ७४ न धर्मस्य क्रिया काचिज्ज्ञायते मूढबुद्धयः । श्रूयतां धर्मसर्वस्वं तापसाः क्रूरचेष्टिताः ॥ ७५ मनोऽनुकूल प्रिया हो सकती हैं। उन्होंने तपस्विनियोंके इस प्रकार कहनेपर हँसते हुए कहा - यह व्रत ऐसा है कि इसका कुछ भी रहस्य प्रकट नहीं किया जा सकता। सौभाग्यशालिनियो ! जहाँ बहुत-से सुननेवाले हों वहाँ इस व्रतकी व्याख्या नहीं की जा सकती। इसलिये यह जानकर आप सभी चली जायँ। उनके ऐसा कहनेपर उन्होंने मुनिसे कहा - मुने ! हम सब (यह जाननेके लिये) एकान्तमें चलेंगी; (क्योंकि) हमें महान् कौतूहल हो रहा है ॥ ६१-६४ ॥ यह कहकर उन सभीने उनको अपने कोमल हाथोंसे पकड़ लिया। कुछ कामसे आतुर होकर कण्ठसे लिपट गयीं और कुछने उन्हें भुजाओंमें बाँध लिया; कुछ स्त्रियोंने उन्हें घुटनोंसे पकड़ लिया; कुछ सुन्दरी स्त्रियाँ उनके केश छूने लगीं; और कुछ उनकी कमरसे लिपट गयीं एवं कुछने उनके पैरोंको पकड़ लिया। मुनियोंने आश्रममें अपनी स्त्रियोंकी अधीरता देख 'मारो-मारो' - इस प्रकार कहते हुए हाथोंमें डंडा और पत्थर लेकर शिवके लिङ्गको ही उखाड़कर फेंक दिया। लिङ्गके गिरा दिये जानेपर भगवान् शंकर अन्तर्हित हो गये ॥ ६५-६८ ॥ वे भगवान् रुद्र उमादेवीके साथ कैलास पर्वतपर चले गये। देवदेव शंकरके लिङ्गके गिरनेपर प्रायः समस्त चर-अचर जगत् नष्ट हो गया। इससे आत्मनिष्ठ महर्षियोंको व्याकुलता हुई। इसी प्रकार देवके (भी) व्याकुल हो जानेपर एक अत्यन्त बुद्धिमान् श्रेष्ठ मुनिने कहा - हम उन महात्मा तापसके सद्भाव (सदाशय) - को नहीं जानते। हम ब्रह्माकी शरणमें चलें। वे ही उनकी चेष्टा (रहस्य) समझ सकेंगे। ऐसा कहनेपर सभी ऋषि अत्यन्त लज्जित हो गये ॥ ६९-७२ ॥ फिर, वे लोग देवताओंसे उपासित ब्रह्माके लोकमें गये। वहाँ देवेश (ब्रह्मा) - को प्रणाम कर लज्जासे मुख नीचा कर खड़े हो गये। उसके बाद ब्रह्माने उन्हें दुःखी देखकर यह वचन कहा - अहो, क्रोध करनेसे तुम सबका मन कलुषित हो गया है, इसलिये मूढ़ हो गये हो। मूढ बुद्धिवालो ! तुम सब धर्मकी कोई वास्तविक क्रिया नहीं जानते। अप्रिय कर्म करनेवाले तापसो ! धर्मके सारभूत रहस्यको सुनो, जिसे