भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| २२८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५२ | | :--- | :--- |

| प्रणम्य शङ्करं देवाः प्रणमन्तु सुतां तव।<br>कुरुष्व पादं शत्रूणां मूर्ध्नि भस्मपरिप्लुतम्॥ ४०<br><br>याचितारो वयं शर्वो वरो दाता त्वमप्युमा।<br>वधूः सर्वजगन्माता कुरु यच्छ्रेयसे तव॥ ४१ | शङ्करजी सबके पिता कहे गये हैं। (हम सबका निवेदन है कि) समस्त देवता शङ्करको प्रणामकर तुम्हारी पुत्रीको भी प्रणाम करें; इसलिये इसे समर्पित कर दें। (और इस प्रकार आप) अपने शत्रुओंके सिरपर अपना भस्मयुक्त चरण रखें (शत्रुओंको विजित करें)। हमलोग याचना करनेवाले हैं, शङ्कर वर हैं, आप दाता हैं और समस्त संसारकी जननी उमा वधू हैं। आपको जो कल्याणकारी जँचे, उसे करें॥ ३७—४१॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>तद्वचोऽङ्गिरसः श्रुत्वा काली तस्थावधोमुखी।<br>हर्षमागत्य सहसा पुनर्दैन्यमुपागता॥ ४२<br>ततः शैलपतिः प्राह पर्वतं गन्धमादनम्।<br>गच्छ शैलानुपामन्त्र्य सर्वानागन्तुमर्हसि॥ ४३<br>ततः शीघ्रतरः शैलो गृहाद् गृहमगाज्जवी।<br>मेर्वादीन् पर्वतश्रेष्ठ्रानाजुहाव समन्ततः॥ ४४<br>तेऽप्यावजग्मुस्त्वरावन्तः कार्यं मत्वा महत्तदा।<br>विविशुर्विस्मयाविष्टाः सौवर्णेष्वासनेषु ते॥ ४५ | पुलस्त्यजी बोले— अङ्गिराकी वह वाणी सुनकर कालीने (लज्जासे) अपना मुख नीचे झुका लिया। सहसा वे प्रसन्न होकर पुनः उदास हो गयीं। उसके बाद गिरिराजने गन्धमादन पर्वतसे कहा— (गन्धमादन!) जाओ! सभी पर्वतोंको आनेके लिये आमन्त्रित कर आओ। उसके पश्चात् वेगशाली पर्वत (गन्धमादन)ने चारों ओर शीघ्रतापूर्वक घर-घर जाकर मेरु आदि सभी श्रेष्ठ पर्वतोंको आनेके लिये निमन्त्रण दे दिया। वे सभी पर्वत भी कार्यकी महत्ता समझकर शीघ्रतासे आ गये और सुवर्णमय आसनोंपर उत्सुकतापूर्वक बैठ गये॥ ४२—४५॥ | | उदयो हेमकूटश्च रम्यको मन्दरस्तथा।<br>उद्दालको वारुणश्च वराहो गरुडासनः॥ ४६<br>शक्तिमान् वेगसानुश्च दृढशृङ्गोऽथ शृङ्गवान्।<br>चित्रकूटस्त्रिकूटश्च तथा मन्दरकाचलः॥ ४७<br>विन्ध्यश्च मलयश्चैव पारियात्रोऽथ दुर्दरः।<br>कैलासाद्रिर्महेन्द्रश्च निषधोऽञ्जनपर्वतः॥ ४८<br>एते प्रधाना गिरयस्तथाऽन्ये क्षुद्रपर्वताः।<br>उपविष्टाः सभायां वै प्रणिपत्य ऋषींश्च तान्॥ ४९ | उदय, हेमकूट, रम्यक, मन्दर, उद्दालक, वारुण, वराह, गरुडासन, शक्तिमान्, वेगसानु, दृढशृङ्ग, शृङ्गवान्, चित्रकूट, त्रिकूट, मन्दरकाचल, विन्ध्य, मलय, पारियात्र, दुर्दर, कैलास, महेन्द्र, निषध, अञ्जन—ये सभी प्रमुख पर्वत तथा छोटे-छोटे अन्य पर्वत उन ऋषियोंको प्रणाम कर सभामें बैठ गये॥ ४६—४९॥ | | ततो गिरीशः स्वां भार्यां मेनामाहूतवांश्च सः।<br>समागच्छत कल्याणी समं पुत्रेण भामिनी॥ ५०<br>साऽभिवन्द्य ऋषीणां हि चरणांश्च तपस्विनी।<br>सर्वाञ् ज्ञातीन् समाभाष्य विवेश ससुता ततः॥ ५१<br>ततोऽद्रिषु महाशैल उपविष्टेषु नारद।<br>उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः सर्वानाभाष्य सुस्वरम्॥ ५२ | उसके पश्चात् उन गिरीशने अपनी भार्या मेनाको बुलाया। (वे) कल्याणी भामिनी अपने पुत्रके साथ आयीं और तब उन साध्वीने ऋषियोंके चरणोंमें प्रणाम किया एवं समस्त ज्ञातियोंसे अनुज्ञा लेकर वे पुत्रके साथ बैठ गयीं। नारदजी! उसके बाद सभी पर्वतोंके भी बैठ जानेपर उनकी अनुमति लेकर उक्ति के अभिप्रायके विज्ञाता महाशैलने मधुर वचन कहा—॥ ५०—५२॥ | | हिमवानुवाच<br>इमे सप्तर्षयः पुण्या याचितारः सुतां मम।<br>महेश्र्वरार्थं कन्यां तु तच्चावेद्यं भवत्सु वै॥ ५३ | हिमवान्ने निवेदन किया— (उपस्थित सज्जनो!) ये पुण्यात्मा सप्तर्षि भगवान् शङ्करके लिये मेरी कन्याकी याचना कर रहे हैं। शङ्करके लिये कन्या देनेका प्रस्ताव है— |