वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
पृष्ठ 247, कुल 489 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 247
अध्याय ५४] भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण और गजाननकी उत्पत्ति २३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पितामहस्ततोवाच देवीं प्रीतोऽस्मि शाश्वते।<br>तपसा धूतपापाऽसि वरं वृणु यथेप्सितम्॥ १८<br>अथोवाच वचः काली व्याघ्रस्य कमलोद्भव।<br>वरदो भव तेनाहं यास्ये प्रीतिमनुत्तमाम्॥ १९<br>ततः प्रादाद् वरं ब्रह्मा व्याघ्रस्याद्भुतकर्मणः।<br>गाणपत्यं विभौ भक्तिमजेयत्वं च धर्मिताम्॥ २० | सनातनि! मैं प्रसन्न हूँ। तुम तपस्या करके निष्पाप हो गयी हो। इच्छानुकूल वर माँगो। इसके बाद कालीने कहा—हे कमलजन्मा (ब्रह्माजी)! इस व्याघ्रको आप वर दें। इससे मैं उत्तम सुख प्राप्त करूँगी। तब ब्रह्माजीने उस अलौकिक कर्म करनेवाले व्याघ्रको गणनायक हो जाने, शङ्करकी भक्ति प्राप्त करने एवं किसीसे न जीते जाने और धार्मिक हो जानेका वर दिया॥ १७–२०॥ |
| वरं व्याघ्राय दत्त्वैवं शिवकान्तामथाऽब्रवीत्।<br>वृणीष्व वरमव्यग्रा वरं दास्ये तवाऽम्बिके॥ २१<br>ततो वरं गिरिसुता प्राह देवी पितामहम्।<br>वरः प्रदीयतां मह्यं वर्णं कनकसंनिभम्॥ २२<br>तथेत्युक्त्वा गतो ब्रह्मा पार्वती चाभवत् ततः।<br>कोशं कृष्णं परित्यज्य पद्माकिञ्जल्कसन्निभा॥ २३<br>तस्मात् कोशाच्च संजाता भूयः कात्यायनी मुने।<br>तामभ्येत्य सहस्त्राक्षः प्रतिजग्राह दक्षिणाम्।<br>प्रोवाच गिरिशां देवो वाक्यं स्वार्थाय वासवः॥ २४ | इस प्रकार व्याघ्रको वर देकर (उन्होंने) शिवकान्ता (पार्वती)-से कहा—अम्बिके! तुम (भी) शान्त चित्तसे वर माँगो। मैं तुम्हें (भी) वर दूँगा। उसके बाद गिरिनन्दिनी पार्वतीदेवीने पितामहसे कहा—ब्रह्मन्! मुझे यही वर दीजिये कि मेरा वर्ण सुवर्णके समान हो जाय। ब्रह्मा 'ऐसा ही हो' कहकर चले गये। पार्वती भी अपने शरीरका कालापन त्यागकर कमलके केसरके समान हो गयीं। मुने! उस कृष्ण कोशसे फिर कात्यायनी उत्पन्न हुई। हजार आँखोंवाले इन्द्रने उनके पास जाकर दक्षिणा ग्रहण की और अपने लिये गिरिजासे यह वचन कहा— ॥ २१–२४॥ |
| इन्द्र उवाच<br>इयं प्रदीयतां मह्यं भगिनी मेऽस्तु कौशिकी।<br>त्वत्कोशसम्भवा चेयं कौशिकी कौशिकोऽप्यहम्॥ २५<br>तां प्रादादिति संश्रुत्य कौशिकीं रूपसंयुताम्।<br>सहस्त्राक्षोऽपि तां गृह्य विन्ध्यं वेगाज्जगाम च॥ २६<br>तत्र गत्वा तथोवाच तिष्ठस्वात्र महाबले।<br>पूज्यमाना सुरैर्नाम्ना ख्याता त्वं विन्ध्यवासिनी॥ २७<br>तत्र स्थाप्य हरिर्देवीं दत्त्वा सिंहं च वाहनम्।<br>भवामरारिहन्त्रीत्युक्त्वा स्वर्गमुपागमत्॥ २८ | इन्द्रने कहा—आप इसे मेरे लिये दे दें। यह कौशिकी मेरी बहन बनेगी। आपके कोशसे उत्पन्न होनेके कारण यह 'कौशिकी' हुई और मैं भी कौशिक हुआ। उसे मैंने दे दिया—इस (प्रतिज्ञा-वचन)-को सुननेके बाद उस रूपवती कौशिकीको लेकर देवराज इन्द्र शीघ्रतापूर्वक विन्ध्यपर्वतपर चले गये। इसके बाद वहाँ जाकर (उन्होंने उससे) कहा—महाबले! तुम यहाँ रहो। देवताओंद्वारा आराधित होती हुई तुम 'विन्ध्यवासिनी' नामसे प्रसिद्ध होगी। इन्द्रने देवीको वहाँ स्थापितकर उनके वाहनके लिये (उन्हें) सिंह दे दिया और तुम देवताओंके शत्रुओंको मारनेवाली बनो—ऐसा कहकर वे स्वर्ग चले गये॥ २५–२८॥ |
| उमाऽपि तं वरं लब्ध्वा मन्दरं पुनरेत्य च।<br>प्रणम्य च महेशानं स्थिता सविनयं मुने॥ २९<br>ततोऽमरगुरुः श्रीमान् पार्वत्या सहितोऽव्ययः।<br>तस्थौ वर्षसहस्रं हि महामोहनके मुने॥ ३०<br>महामोहस्थिते रुद्रे भुवनाश्रेलुरुद्धताः।<br>चक्षुभुः सागराः सप्त देवाश्च भयमागमन्॥ ३१ | मुने! उमादेवी भी उस वरको प्राप्त करके मन्दर-पर्वतपर चली गयीं और महेशको प्रणाम कर विनीतभावसे रहने लगीं। मुने! उसके पश्चात् पार्वतीके साथ श्रीमान् अव्यय देवगुरु एक हजार वर्षोंतक महामोहनक (सुरतलीलामें) स्थित रहे। रुद्रदेवके महामोहमें स्थित होनेपर समस्त भुवन क्षुब्ध होकर विचलित हो गये। सातों सागर खलबला उठे और देवगण भयभीत हो गये। |