भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

पृष्ठ 356, कुल 489 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 356
३४६श्रीवामनपुराण[ अध्याय ७०

| विरथं तु कृतं पश्चादेनं धक्ष्यति शङ्करः।<br>नोपेक्ष्यः शत्रुरुद्दिष्टो देवाचार्येण देवताः॥ १३<br><br>इत्येवमुक्ताः प्रमथा वासुदेवेन सामराः।<br>चक्रुवेगं सहेन्द्रेण समं चक्रधरेण च॥ १४ | शत्रुको बिना रथका कर दें। बिना रथका करनेके बाद तो शंकर इसे भस्म कर देंगे। देवो! देवताओंके आचार्य बृहस्पतिने कहा है कि शत्रु की उपेक्षा नहीं करनी चाहिये। भगवान् वासुदेवके ऐसा कहनेपर इन्द्र एवं विष्णुसहित प्रमथों तथा देवोंने शीघ्रतासे चढ़ाई कर दी॥ ११-१४॥ | | तुरगाणां सहस्रं तु मेघाभानां जनार्दनः।<br>निमिषान्तरमात्रेण गदया विनिपोथयत्॥ १५<br><br>हताश्वात् स्यन्दनात् स्कन्दः प्रगृह्य रथसारथिम्।<br>शक्त्या विभिन्नहृदयं गतासुं व्यसृजद् भुवि॥ १६<br><br>विनायकाद्याः प्रमथाः समं शक्रेण दैवतैः।<br>सध्वजाक्षं रथं तूर्णमभञ्जन्त तपोधनाः॥ १७<br><br>सहसा स महातेजा विरथस्त्यज्य कार्मुकम्।<br>गदामादाय बलवानभिदुद्राव दैवतान्॥ १८ | जनार्दन (विष्णु)-ने क्षणमात्रमें ही अपनी (कौमोदकी) गदासे बादल-जैसे काले रंगवाले हजारों घोड़ोंको मार डाला। स्कन्दने मारे गये घोड़ोंवाले रथसे सारथिको खींचकर शक्तिसे उसके हृदयको विदीर्ण कर दिया और प्राणहीन हो जानेपर उसे पृथ्वीपर फेंक दिया। इन्द्र आदि देवताओंके साथ तपोधन विनायक प्रभृति प्रमथोंने शीघ्र ध्वजा और पहिये तथा धुरेके साथ रथको तोड़ डाला। (जब) महातेजस्वी पराक्रमी (अन्धक)-ने बिना रथके हो जानेपर धनुषको छोड़ दिया और गदा लेकर वह देवताओंकी ओर दौड़ पड़ा - ॥ १५-१८॥ | | पदान्यष्टौ ततो गत्वा मेघगम्भीरया गिरा।<br>स्थित्वा प्रोवाच दैत्येन्द्रो महादेवं स हेतुमत्॥ १९<br><br>भिक्षो भवान् सहानीकस्त्वसहायोऽस्मि साम्प्रतम्।<br>तथाऽपि त्वां विजेष्यामि पश्य मेऽद्य पराक्रमम्॥ २०<br><br>तद्वाक्यं शङ्करः श्रुत्वा सेन्द्रान्सुरगणांस्तदा।<br>ब्रह्मणा सहितान् सर्वान् स्वशरीरे न्यवेशयत्॥ २१<br><br>शरीरस्थांस्तान् प्रमथान् कृत्वा देवांश्च शङ्करः।<br>प्राह एह्येहि दुष्टात्मन् अहमेकोऽपि संस्थितः॥ २२ | तब दैत्येन्द्रने आठ पग चलकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें महादेवसे अपना अभीष्ट वचन कहा- भिक्षुक! यद्यपि इस समय तुम सेनावाले हो और मैं असहाय हूँ, फिर भी मैं तुमको जीत लूँगा। आज मेरी शक्ति देखो। उसका वचन सुनकर शंकरने इन्द्र और ब्रह्माके साथ सभी देवताओंको अपने शरीरमें निवेशित कर लिया - छिपा लिया। उन प्रमथों एवं देवोंको अपने शरीरमें छिपानेके बाद शंकरने कहा- दुष्टात्मन्! आओ, आओ! मैं अकेला रहनेपर भी (तुमसे लड़नेके लिये) खड़ा हूँ॥ १९-२२॥ | | तं दृष्ट्वा महदाश्चर्यं सर्व्वामरगणक्षयम्।<br>दैत्यः शङ्करमभ्यागाद् गदामादाय वेगवान्॥ २३<br><br>तमापतन्तं भगवान् दृष्ट्वा त्यक्त्वा वृषोत्तमम्।<br>शूलपाणिर्गिरिप्रस्थे पदातिः प्रत्यतिष्ठत॥ २४<br><br>वेगेनैवापतन्तं च बिभेदोरसि भैरवः।<br>दारुणं सुमहद् रूपं कृत्वा त्रैलोक्यभीषणम्॥ २५<br><br>दंष्ट्राकरालं रविकोटिसंनिभं मृगारिचर्माभिवृतं जटाधरम्।<br>भुजङ्गहारामलकण्ठकन्दरं विंशार्धबाहुं सषडर्धलोचनम्॥ २६ | समस्त देवगणोंसे संहार किये जाते उस महान् आश्चर्यको देखकर वह दैत्य गदा लेकर शीघ्रतासे शंकरके पास चला गया। भगवान् शूलपाणि उसे आते देख अपने श्रेष्ठ वृषभ (नन्दी)-को छोड़कर पर्वतपर पैरोंके बल खड़े हो गये। भैरवने तीनों लोकोंको डरा देनेवाला अत्यन्त भयानक रूप धारण करके तेजीसे आ रहे उस (अन्धक)-का हृदय विदीर्ण कर दिया। (उस समय शंकरका रूप) भयानक दाढ़ोंवाले करोड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान, बाघम्बर पहने, जटासे सुशोभित, सर्पके हारसे अलंकृत ग्रीवावाला तथा दस भुजा और तीन नयनोंसे युक्त था॥ २३-२६॥ |