वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ७३ ] | बलि, मय-प्रभृति दैत्योंका देवताओंके साथ युद्ध और कालनेमिका वध | ३६५ | | :--- | :--- | | तं दृष्ट्वा वर्द्धमानं रिपुमतिबलिनं देवगन्धर्वमुख्याः<br>सिद्धाः साध्याश्विमुख्या भयतरलदृशः प्राद्रवन् दिक्षु सर्वे।<br>पोप्लूयन्तश्च दैत्या हरिममरगणैरर्चितं चारुमौलिं<br>नानाशास्त्रास्त्रपातैर्विगलितयशसं चक्रुरुत्सिक्तदर्पाः ॥ ३९<br>तानित्थं प्रेक्ष्य दैत्यान् मयबलिपुरगान् कालनेमिप्रधानान्<br>बाणैराकृष्य शार्ङ्गं त्वनवरतमुरोभेदिभिर्वज्रकल्पैः ।<br>कोपादारक्तदृष्टिः सरथगजहयान् दृष्टिनिर्धूतवीर्यान्<br>नाराचाख्यैः सुपुङ्खैर्जलद इव गिरीन् छादयामास विष्णुः ॥ ४०<br>तैर्बाणैश्छाद्यमाना हरिकरनुदितैः कालदण्डप्रकाशै-<br>र्नाराचैरर्धचन्द्रैर्बलिमयपुरगा भीतभीतास्त्वरन्तः ।<br>प्रारम्भे दानवेन्द्रं शतवदनमथो प्रेषयन् कालनेमिं<br>स प्रायाद् देवसैन्यप्रभुममितबलं केशवं लोकनाथम् ॥ ४१ | उस बलिष्ठ शत्रुको बढ़ते देखकर देवता, गन्धर्व, सिद्ध, साध्य, अश्विनीकुमार आदि भयसे इधर-उधर (देखते हुए घबड़ाकर) चारों ओर भागने लगे। उछलते-कूदते हुए दैत्य अत्यन्त घमण्डके साथ देवोंसे पूजित सुन्दर मुकुटवाले विष्णुभगवान्के सामने जाकर अनेक प्रकारके शस्त्रास्त्रोंके आघातसे उनके (अजेयत्ववाले) यशको समाप्त करने लगे—विष्णुकी पराजय मानने लगे। इस प्रकार प्रहार कर रहे मय, बलि एवं कालनेमि आदि दैत्योंको देखकर विष्णुके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। फिर तो उन्होंने अपनी दृष्टिसे ही रथ, हाथी और घोड़ोंको शक्ति और पराक्रमसे रहित कर दिया तथा उसी तरह सुन्दर पंखोंवाले लोहेके बने अर्द्धचन्द्रके समान 'नाराच' बाणोंसे पर्वतको ढक दिया, जैसे मेघ पर्वतको ढक देते हैं। विष्णुके हाथोंसे छोड़े गये कालदण्डके समान अर्धचन्द्राकार उन लोहेके बने 'नाराच' बाणोंसे ढके हुए बलि एवं मय आदि दैत्योंने डरकर तुरंत पहले दानवेन्द्र शतमुख कालनेमिको प्रेषित किया। वह अति बलवान् देव सेनापति लोकनाथ केशवके सामने उपस्थित हुआ॥ ३८-४१॥ | | तं दृष्ट्वा शतशीर्षमुद्यतगदं शैलेन्द्रशृङ्गाकृतिं<br>विष्णुः शार्ङ्गमपास्य सत्वरमथो जग्राह चक्रं करे।<br>सोऽप्येनं प्रसमीक्ष्य दैत्यविटपप्रच्छेदनं मानिनं<br>प्रोवाचाथ विहस्य तं च सुचिरं मेघस्वनो दानवः ॥ ४२ | गदा उठाये हुए सौ सिरवाले पर्वतशृंगके समान कालनेमिको देखकर विष्णुने (अपने) शार्ङ्गधनुषको छोड़कर हाथमें जल्दीसे चक्रको ले लिया। इनको देखकर बहुत देरतक जोरसे हँसते हुए मेघके समान बोलनेवाले उस कालनेमि दानवने दैत्यरूपी वृक्षोंके | | अयं स दनुपुत्रसैन्यवित्रासकृद्रिपुः<br>परमकोपितः स मधोर्विघातकृत्।<br>हिरण्यनयनान्तकः कुसुमपूजारतिः<br>क्व याति मम दृष्टिगोचरे निपतितः खलः ॥ ४३ | काटनेवाले सुख-दुःखकी परवाह न करनेवाले मनस्वी हरिसे कहा—यही दानव-सेनाको डरानेवाला शत्रु, अत्यन्त क्रोधी, मधुको मारनेवाला, हिरण्याक्षका वध करनेवाला और फूलोंसे की गयी पूजासे प्रसन्न होनेवाला है। यह खल मेरी आँखोंके सामने आकर अब कहाँ जा सकता | | यद्येष संप्रति ममाहवमभ्युपैति<br>नूनं न याति निलयं निजम्बुजाक्षः।<br>मन्मुष्टिपिष्टशिथिलाङ्गमुपात्तभस्म<br>संद्रक्ष्यते सुरजनो भयकातराक्षः ॥ ४४ | है। यह कमलनयन यदि इस समय मेरे साथ युद्ध करे तो अपने घर नहीं जा सकेगा और तब देवतालोग मेरी मुट्ठीमें पिसनेसे शिथिल अङ्गोंवाले इस (विष्णु)-को भयसे कातर नेत्रोंसे धूलिधूसरित हुआ देखेंगे। |