वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ९५ ] पुराण-वाचन, श्रावण-श्रवण और पठनकी फलश्रुति ४७७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रत्नस्य दानस्य च यत्फलं भवेद्<br>यत्सूर्यस्य चेन्दोर्ग्रहणे च राहोः।<br>अन्नस्य दानेन फलं यथोक्तं<br>बुभुक्षिते विप्रवरे च साग्निके॥ ९<br><br>दुर्भिक्षसम्पीडितपुत्रभार्ये<br>यामी सदा पोषणतत्परे च।<br>देवाग्निविप्रर्षिरते च पित्रोः<br>शुश्रूषके भ्रातरि ज्येष्ठसाम्ग्रे।<br>यत्तत्फलं सम्प्रवदन्ति देवाः<br>स तत् फलं लभते चास्य पाठात्॥ १० | देवगण रत्नदान, राहुद्वारा सूर्य एवं चन्द्रके ग्रस्त होनेके समय किये गये दान, भूखे, अग्निहोत्री, उत्तम ब्राह्मणको दिये गये अन्नदान, अकालसे पीडित, पुत्र, पत्नी एवं भाई-बन्धुके पोषणमें तत्पर पुरुषको दिये गये दान, देवता, अग्नि एवं ब्राह्मणकी सेवामें लगे रहनेवाले व्यक्तिको तथा माता-पिता और ज्येष्ठ भाईको दिये गये दानसे जिस फलका प्राप्त होना बतलाते हैं, वह फल मनुष्य इस (वामनपुराण)-का पाठ करनेसे प्राप्त कर लेता है॥ ६-१०॥ |
| चतुर्दशं वामनमाहुरग्र्यं<br>श्रुते च यस्याघचयश्च नाशम्।<br>प्रयान्ति नास्त्यत्र च संशयो मे<br>महान्ति पापान्यापि नारदाशु॥ ११<br><br>पाठात् संश्रवणाद् विप्र श्रावणादपि कस्यचित्।<br>सर्वपापानि नश्यन्ति वामनस्य सदा मुने॥ १२<br><br>इदं रहस्यं परमं तवोक्तं<br>न वाच्यमेतद्धरिभक्तिवर्जिते।<br>द्विजस्य निन्दारतिहीनदक्षिणे<br>सहेतुवाक्यावृतपापसत्त्वे ॥ १३<br><br>नमो नमः कारणवामनाय<br>नाराणायामितविक्रमाय ।<br>श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय<br>नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय॥ १४<br><br>इत्थं वदेद् यो नियतं मनुष्यः कृष्णभावनः।<br>तस्य विष्णुः पदं मोक्षं ददाति सुरपूजितः॥ १५<br><br>वाचकाय प्रदातव्यं गोभूस्वर्णविभूषणम्।<br>वित्तशाठ्यं न कर्तव्यं कुर्वन् श्रवणनाशकम्॥ १६<br><br>त्रिसन्ध्यं च पठन् शृण्वन् सर्वपापप्रणाशनम्।<br>असूयारहितं विप्र सर्वसम्पत्प्रदायकम्॥ १७ | नारदजी! वामनपुराण पुराणोंमें चौदहवाँ उत्तम पुराण है। इसमें मुझे सन्देह नहीं है कि इसका श्रवण करनेसे पापोंका समुदाय एवं महापातक भी शीघ्र नष्ट हो जाते हैं। मुने! ब्राह्मणदेव! वामनपुराणका पाठ कहने, सुनने एवं सुनानेसे सर्वदा सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। मैंने आपसे यह परम रहस्य कहा है। इसे भगवान्की भक्तिसे रहित व्यक्तिके एवं ब्राह्मणकी निन्दा करनेवाले आचारहीन तथा तर्कशील पापी मनुष्यके सामने नहीं कहना चाहिये। देवोंके कारण वामनरूप धारण करनेवाले अमित पराक्रमी श्रीनारायण भगवान्को नमस्कार है, नमस्कार है और शार्ङ्ग, चक्र, खड्ग तथा गदा धारण करनेवाले पुरुषोत्तमभगवान्को नमस्कार है। इस प्रकार जो मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णमें अपनी भावनाओंको समर्पित कर इस वामनपुराणका नित्य पाठ करता है, उसे देवताओंसे पूजित भगवान् विष्णु मोक्षपद प्रदान करते हैं। इस पुराणके बाँचनेवालेको (पुराणका पाठ करनेवालेको भी) गौ, पृथ्वी एवं स्वर्णके आभूषण प्रदान करने चाहिये। इसमें धनकी शठता (शक्तिसे कम दक्षिणा देना) नहीं करनी चाहिये; क्योंकि ऐसा करनेसे सुननेके फलका नाश हो जाता है। विप्रदेव! जलन, ईर्ष्या, रोष आदि दोषोंसे रहित होकर तीनों संध्याओंके समय समस्त पापोंके विनाश करनेवाले इस पुराणका पाठ करने एवं श्रवण करनेसे सभी प्रकारकी सम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं॥ ११-१७॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें पंचानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ९५॥
॥ श्रीवामनपुराण समाप्त॥