भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ७ ] उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग-नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम ३९ तदेव तनु चार्वङ्ग्या वलित्रयविभूषितम्। उदरं राजते श्लक्ष्णं रोमावलिविभूषितम् ॥ ८ सुन्दरीका वैसा ही कृश, त्रिवलीयुक्त, कोमल तथा रोमावलिवाला उदर भी शोभित हो रहा है। उदरपर नीचेसे ऊपरकी ओर स्तनतटतक जाती हुई इसकी रोमराजि रोमावली च जघनाद् यान्ती स्तनतटं त्वियम्। राजते भृङ्गमालेव पुलिनात् कमलाकरम् ॥ ९ सरोवर आदिके तटसे कमलवृन्दकी ओर जाती हुई भ्रमर-मण्डलीके समान सुशोभित हो रही है॥ ६-९॥ जघनं त्वतिविस्तीर्णं भात्यस्या रशनावृतम्। क्षीरोदमथने नद्धं भुजङ्गेनेव मन्दरम् ॥ १० इसका करधनीसे मण्डित स्थूल जघन-प्रदेश क्षीरसागरके मन्थनके समयमें वासुकि नागसे वेष्टित मन्दरपर्वतके समान सुशोभित हो रहा है। कदली- कदलीस्तम्भसदृशैरूर्ध्वमूलैरथोरुभिः । विभाति सा सुचार्वङ्गी पद्मकिञ्जल्कसंनिभा ॥ ११ स्तम्भके समान ऊर्ध्वमूल ऊरुओंवाली कमलके केसरके समान गौरवर्णकी यह सुन्दरी है। इसके दोनों घुटने, गूढ़गुल्फ, रोमरहित सुन्दर जंघा तथा अलक्तकके समान जानुनी गूढगुल्फे च शुभे जङ्घे त्वरोमशे। विभातोऽस्यास्तथा पादावलक्तकसमत्विषौ ॥ १२ कान्तिवाले दोनों पैर अत्यन्त सुशोभित हो रहे हैं। मुने! इस प्रकार उस सुन्दरीके विषयमें सोचते हुए जब यह इति संचिन्तयन् कामस्तामनिन्दितलोचनाम्। कामातुरोऽसौ संजातः किमुतान्यो जनो मुने ॥ १३ कामदेव स्वयमेव कामातुर हो गया तो फिर अन्य पुरुषोंकी तो बात ही क्या थी॥ १०-१३॥ माधवोऽप्युर्वशीं दृष्ट्वा संचिन्तयत नारद। किंस्वित् कामनरेन्द्रस्य राजधानी स्वयं स्थिता ॥ १४ नारदजी! अब वसन्त भी उस उर्वशीको देखकर सोचने लगा कि क्या यह राजा कामकी राजधानी ही स्वयं आयाता शशिनो नूनमियं कान्तिर्निशाक्षये। रविरश्मिप्रतापार्तिभीता शरणमागता ॥ १५ आकर उपस्थित हो गयी है? अथवा रात्रिका अन्त होनेपर सूर्यकी किरणोंके तापके भयसे स्वयं चन्द्रिका ही शरणमें आ गयी है। इस प्रकार सोचते हुए अप्सराओंको रोककर इत्थं संचिन्तयन्नेव अवष्टभ्याप्सरोगणम्। तस्थौ मुनिरिव ध्यानमास्थितः स तु माधवः ॥ १६ वसन्त मुनिके सदृश ध्यानस्थ हो गया। महामुने ! उसके बाद शुभव्रत नारायण मुनिने कामादि सभीको चकित ततः स विस्मितान् सर्वान् कन्दर्पादीन् महामुने। दृष्ट्वा प्रोवाच वचनं स्मितं कृत्वा शुभव्रतः ॥ १७ देखकर हँसते हुए कहा- हे काम, हे अप्सराओ, हे वसन्त ! यह अप्सरा मेरी जाँघसे उत्पन्न हुई है। इसे तुमलोग इयं ममोरुसम्भूता कामाप्सरस माधव। नीयतां सुरलोकाय दीयतां वासवाय च ॥ १८ देवलोकमें ले जाओ और इन्द्रको दे दो। उनके ऐसा कहनेपर वे सभी भयसे काँपते हुए उर्वशीको लेकर स्वर्गमें इत्युक्ताः कम्पमानास्ते जग्मुर्गृह्योर्वशीं दिवम्। सहस्राक्षाय तां प्रादाद् रूपयौवनशालिनीम् ॥ १९ चले गये और उस रूप-यौवनशालिनी अप्सराको इन्द्रको दे दिया। महामुने! उन कामादिने इन्द्रसे उन दोनों धर्मके आचक्षुश्चरितं ताभ्यां धर्मजाभ्यां महामुने। देवराजाय कामाद्यास्ततोऽभूद् विस्मयः परः ॥ २० पुत्रों (नर-नारायण)-के चरित्रको कहा, जिससे इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। नर और नारायणके इस चरित्रकी एतादृशं हि चरितं ख्यातिमग्र्यां जगाम ह। पातालेषु तथा मर्त्ये दिक्ष्वष्टासु जगाम च ॥ २१ चर्चा आगे सर्वत्र बढ़ती गयी तथा वह पाताल, मर्त्यलोक एवं सभी दिशाओंमें व्याप्त हो गयी ॥ १४-२१॥ एकदा निहते रौद्रे हिरण्यकशिपौ मुने। अभिषिक्तस्तदा राज्ये प्रह्लादो नाम दानवः ॥ २२ मुने! एक बारकी बात है। जब भयंकर हिरण्यकशिपु मारा गया तब प्रह्लाद नामक दानव राजगद्दीपर बैठा।