भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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पृष्ठ 57

अध्याय ८ ] प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय ४७ प्रह्लाद उवाच कस्त्वां जेतुं प्रभो शक्तः कस्वतः पुरुषोऽधिकः । त्वं हि नारायणोऽनन्तः पीतवासा जनार्दनः ॥ ४८ त्वं देवः पुण्डरीकाक्षस्त्वं विष्णुः शार्ङ्गचापधृक् । त्वमव्ययो महेशानः शाश्वतः पुरुषोत्तमः ॥ ४९ त्वां योगिनश्चिन्तयन्ति चार्चयन्ति मनीषिणः । जपन्ति स्नातकास्त्वां च यजन्ति त्वां च याज्ञिकाः ॥ ५० त्वमच्युतो हृषीकेशश्चक्रपाणिर्धराधरः । महामीनो हयशिरास्त्वमेव वरकच्छपः ॥ ५१ हिरण्याक्षरिपुः श्रीमान् भगवनान्थ सूकरः । मत्पितुर्नाशनकरो भवानपि नृकेसरी ॥ ५२ ब्रह्मा त्रिनेत्रोऽमरराड् हुताशः प्रेताधिपो नीरपतिः समीरः । सूर्यो मृगाङ्कोऽचलजङ्गमाद्यो भगवान् विभो नाथ खगेन्द्रकेतो ॥ ५३ त्वं पृथ्वी ज्योतिराकाशं जलं भूत्वा सहस्रशः । त्वया व्याप्तं जगत्सर्वं कस्त्वां जेष्यति माधव ॥ ५४ भक्त्या यदि हृषीकेश तोषमेषि जगद्गुरो । नान्यथा त्वं प्रशक्योऽसि जेतुं सर्वगताव्यय ॥ ५५ भगवानुवाच परितुष्टोऽस्मि ते दैत्य स्तवेनानेन सुव्रत । भक्त्या त्वनन्यया चाहं त्वया दैत्य पराजितः ॥ ५६ पराजितश्च पुरुषो दैत्य दण्डं प्रयच्छति । दण्डार्थं ते प्रदास्यामि वरं वृणु यमिच्छसि ॥ ५७ प्रह्लाद उवाच नारायणं वरं याचे यं त्वं मे दातुमर्हसि । तन्मे पापं लयं यातु शारीरं मानसं तथा ॥ ५८ वाचिकं च जगन्नाथ यत्त्वया सह युध्यतः । नरेण यद्यप्यभवद् वरमेतत्प्रयच्छ मे ॥ ५९ नारायण उवाच एवं भवतु दैत्येन्द्र पापं ते यातु संक्षयम् । द्वितीयं प्रार्थय वरं तं ददामि तवासुर ॥ ६० प्रह्लाद उवाच या या जायेत मे बुद्धिः सा सा विष्णो त्वदाश्रिता । देवार्चने च निरता त्वच्चित्ता त्वत्परायणा ॥ ६१ प्रह्लाद बोले- प्रभो ! आपको भला कौन जीत सकता है ? आपसे बढ़कर कौन हो सकता है ? आप ही अनन्त नारायण पीताम्बरधारी जनार्दन हैं। आप ही कमलनयन शार्ङ्गधनुषधारी विष्णु हैं। आप अव्यय, महेश्वर तथा शाश्वत परम पुरुषोत्तम हैं। योगिजन आपका ही ध्यान करते हैं। विद्वान् पुरुष आपकी ही पूजा करते हैं। वेदज्ञ आपके नामका जप करते हैं तथा याज्ञिकजन आपका यजन करते हैं। आप ही अच्युत, हृषीकेश, चक्रपाणि, धराधर, महामत्स्य, हयग्रीव तथा श्रेष्ठ कच्छप (कूर्म) अवतारी हैं ॥ ४८-५१ ॥ आप हिरण्याक्ष दैत्यका वध करनेवाले ऐश्वर्य- युक्त और भगवान् आदि वाराह हैं। आप ही मेरे पिताको मारनेवाले भगवान् नृसिंह हैं। आप ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण और वायु हैं। हे स्वामिन् ! हे खगेन्द्रकेतु (गरुड़ध्वज) ! आप सूर्य, चन्द्र तथा स्थावर और जंगमके आदि हैं। पृथ्वी, अग्नि, आकाश और जल आप ही हैं। सहस्रों रूपोंसे आपने समस्त जगत्को व्याप्त किया है। माधव ! आपको कौन जीत सकेगा ? जगद्गुरो ! हृषीकेश ! आप भक्तिसे ही संतुष्ट हो सकते हैं। हे सर्वगत ! हे अविनाशिन् ! आप दूसरे किसी भी अन्य प्रकारसे नहीं जीते जा सकते ॥ ५२-५५ ॥ श्रीभगवान् बोले- सुव्रत ! दैत्य ! तुम्हारी इस स्तुतिसे मैं अत्यन्त संतुष्ट हूँ। दैत्य ! अनन्य भक्तिसे तुमने मुझे जीत लिया है। प्रह्लाद ! पराजित पुरुष विजेताको दण्ड (-के रूपमें कुछ) देता है। परंतु मैं तुम्हारे दण्डके बदले तुम्हें वर दूँगा; तुम इच्छित वर माँगो ॥ ५६-५७ ॥ प्रह्लादजी बोले- हे नारायण ! मैं आपसे वर माँग रहा हूँ; आप उसे देनेकी कृपा करें। हे जगन्नाथ ! आपके तथा नरके साथ युद्ध करनेमें मेरे शरीर, मन और वाणीसे जो भी पाप (अपकर्म) हुआ हो वह सब नष्ट हो जाय। आप मुझे यही वर दें ॥ ५८-५९ ॥ नारायणने कहा- दैत्येन्द्र ! ऐसा ही होगा। तुम्हारा पाप नष्ट हो जाय। अब प्रह्लाद ! तुम दूसरा एक वर और माँग लो, मैं उसे भी तुम्हें दूँगा ॥ ६० ॥ प्रह्लादजी बोले- हे भगवन् ! मेरी जो भी बुद्धि हो, वह आपसे ही सम्बद्ध हो, वह देवपूजामें लगी रहे। मेरी बुद्धि, आपका ही ध्यान करे और आपके चिन्तनमें लगी रहे ॥ ६१ ॥