वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १२ क्लेशयन्ति हि विप्रादीन् ये ह्यकर्मसु पापिनः । ते पिष्यन्ते शिलापेषे शोष्यन्तेऽपि च शोषकैः ॥ २८ न्यासापहारिणः पापा बध्यन्ते निगडैरपि । क्षुत्क्षामाः शुष्कताल्वोष्ठाः पात्यन्ते वृश्चिकाशने ॥ २९ पर्वमैथुनिनः पापाः परदाररताश्च ये। ते वह्नितप्तां कूटाग्रामालिङ्गन्ते च शाल्मलीम् ॥ ३० उपाध्यायमधःकृत्य यैरधीतं द्विजाधमैः । तेषामध्यापको यश्च स शिलां शिरसा वहेत् ॥ ३१ मूत्रश्लेष्मपुरीषाणि यैरूत्सृष्टानि वारिणि। ते पात्यन्ते च विण्मूत्रे दुर्गन्धे पूयपूरिते ॥ ३२ श्राद्धातिथ्यर्थमन्योन्यं यैरभुक्तं भुवि मानवैः । परस्परं भक्ष्यन्ते मांसानि स्वानि बालिशाः ॥ ३३ वेदवह्निगुरुत्यागी भार्यापित्रोस्तथैव च। गिरिशृङ्गादधःपातं पात्यन्ते यमकिंकरैः ॥ ३४ पुनर्भूयतयो ये च कन्याविध्वंसकाश्च ये। तद्गर्भश्राद्धभुग् यश्च कृमीन्भक्षेत्पिपीलिकाः ॥ ३५ चाण्डालादन्त्यजाद्वापि प्रतिगृह्णाति दक्षिणाम्। याजको यजमानश्च सो श्मान्तः स्थूलकीटकः ॥ ३६ पृष्ठमांसशिनो मूढास्तथैवोत्कोचजीविनः । क्षिप्यन्ते वृकभक्षे ते नरके रजनीचर ॥ ३७ स्वर्णस्तेयी च ब्रह्मघ्नः सुरापी गुरुतल्पगः । तथा गोभूमिहर्त्तारो गोस्त्रीबालहनाश्च ये ॥ ३८ एते नरा द्विजा ये च गोषु विक्रयिणस्तथा । सोमविक्रयिणो ये च वेदविक्रयिणस्तथा ॥ ३९ कूटसभ्यास्त्वशौचाश्च नित्यनैमित्तनाशकाः । कूटसाक्ष्यप्रदा ये च ते महारौरवे स्थिताः ॥ ४० दशवर्षसहस्राणि तावत् तामिस्रके स्थिताः । तावच्चैवान्धतामिस्रे असिपत्रवने ततः ॥ ४१ तावच्चैव घटीयन्त्रे तप्तकुम्भे ततः परम्। प्रपातो भवते तेषां यैरिदं दुष्कृतं कृतम् ॥ ४२ जो लोग ब्राह्मणोंको कुकर्मोंमें लगाकर उन्हें क्लेश देते हैं, वे पापी मनुष्य शिलाओंपर पीसे जाते हैं और अग्नि- सूर्य आदिद्वारा शोषित भी किये जाते हैं॥ २५-२८॥ जो धरोहरको चुरा लेते हैं, उन्हें बेड़ी लगाकर भूखसे पीड़ित एवं सूखे तालु और ओठकी अवस्थामें वृश्चिकाशन नामक नरकमें गिराया जाता है। जो पर्वोंमें मैथुन करते तथा परस्त्री-संग करते हैं, उन पापियोंको वह्नितप्त कीलोंवाले शाल्मलिका (विवशतासे) आलिङ्गन करना पड़ता है। जो द्विज उपाध्यायको स्वयंकी अपेक्षा निम्नासनपर बैठाकर अध्ययन करता है, उन अधम द्विजों एवं उनके अध्यापकको सिरपर शिला वहन करनी पड़ती है। जो जलमें मूत्र, कफ एवं मलका त्याग करते हैं, उन्हें दुर्गन्धयुक्त विष्ठा और पीबसे पूर्ण विण्मूत्र नामक नरकमें गिराया जाता है॥ २९-३२॥ जो इस संसारमें श्राद्धके अवसरपर अतिथिके निमित्त तैयार किये गये पदार्थको परस्पर भक्षण कर लेते हैं, उन मूर्खोंको परलोकमें एक-दूसरेका मांस खाना पड़ता है। जो वेद, अग्नि, गुरु, भार्या, पिता एवं माताका त्याग करते हैं, उन्हें यमदूत गिरिशिखरके ऊपरसे नीचे गिराते हैं। जो विधवासे विवाह कराते, अविवाहित कन्याको दूषित करते एवं उक्त प्रकारसे उत्पन्न व्यक्तियोंकी सन्तानके यहाँ श्राद्धमें भोजन करते हैं, उन्हें कृमि तथा पिपीलिकाका भक्षण करना पड़ता है। जो ब्राह्मण चाण्डाल और अन्त्यजोंसे दक्षिणा लेते हैं उन्हें तथा उनके यजमानको पत्थरोंमें रहनेवाला स्थूल कीट बनना पड़ता है॥ ३३-३६॥ राक्षस! जो पीठपीछे शिकायत करते हैं-चुगली करते एवं घूस लेते हैं, उन्हें वृकभक्ष नामक नरकमें डाला जाता है। इसी प्रकार सोना चुरानेवाले, ब्रह्महत्यारे, मद्यपी, गुरुपत्नीगामी, गाय तथा भूमिकी चोरी करनेवाले एवं स्त्री तथा बालकको मारनेवाले मनुष्यों तथा गो, सोम एवं वेदका विक्रय करनेवाले, दम्भी, टेढ़ी भाषामें झूठी गवाही देनेवाले तथा पवित्रताके आचरणको छोड़ देनेवाले और नित्य एवं नैमित्तिक कर्मोंके नाश करनेवाले द्विजोंको महारौरव नामक नरकमें रहना पड़ता है॥ ३७-४०॥ उपर्युक्त प्रकारके पापियोंको दस हजार वर्ष तामिस्र नरकमें तथा उतने ही वर्षोंतक अन्धतामिस्र और असिपत्र- वन नामक नरकमें रहनेके बादमें भी-उतने ही वर्षोंतक घटीयन्त्र और तप्तकुम्भमें रहना पड़ता है। जिन भयंकर