वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १३ |
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| कलासु मुख्या गणितज्ञता च विज्ञानमुख्येषु यथेन्द्रजालम्।<br>शाकेषु मुख्या त्वपि काकमाची रसेषु मुख्यं लवणं यथैव॥ ५३<br>तुङ्गेषु तालो नलिनीषु पम्पा वनौकसेष्वेव च ऋक्षराजः।<br>महीरुहेष्वेव यथा वटश्च यथा हरो ज्ञानवतां वरिष्ठः॥ ५४<br>यथा सतीनां हिमवत्सुता हि यथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा।<br>यथा वृषाणामपि नीलवर्णो यथैव सर्वेष्वपि दुःसहेषु।<br>दुर्गेषु रौद्रेषु निशाचरेश नृपातनं वैतरणी प्रधाना॥ ५५<br>पापीयसां तद्वदिह कृतघ्नः सर्वेषु पापेषु निशाचरेन्द्र।<br>ब्रह्मघ्नगोघ्नादिषु निष्कृतिर्हि विद्येत नैवास्य तु दुष्टचारिणः।<br>न निष्कृतिश्चास्ति कृतघ्नवृत्तेः सुहृत्कृतं नाशयतोऽब्दकोटिभिः॥ ५६ | निशाचर! जैसे कलाओंमें गणितका जानना, विज्ञानोंमें इन्द्रजाल, शाकोंमें मकोय, रसोंमें नमक, ऊँचे पेड़ोंमें ताड़, कमल-सरोवरोंमें पंपासर, बनैले जीवोंमें भालू, वृक्षोंमें वट, ज्ञानियोंमें महादेव वरिष्ठ हैं; जैसे सतियोंमें हिमालयकी पुत्री पार्वती, गौओंमें काली गाय, बैलोंमें नील रंगका बैल, सभी दुःसह कठिन एवं भयंकर नरकोंमें नृपातन वैतरणी प्रधान है, उसी प्रकार हे निशाचरेश! पापियोंमें कृतघ्न प्रधानतम पापी होता है। ब्रह्म-हत्या एवं गोहत्या आदि पापोंकी निष्कृति तो हो जाती है, पर दुराचारी पापी एवं मित्र-द्रोही कृतघ्नका करोड़ों वर्षोंमें भी निस्तार नहीं होता॥ ५३-५६॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १२ ॥
तेरहवाँ अध्याय
सुकेशि के प्रश्नके उत्तरमें ऋषियोंका जम्बू-द्वीपकी स्थिति और उनमें स्थित पर्वत तथा नदियोंका वर्णन
| सुकेशिरुवाच | सुकेशिने कहा— |
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| भवद्भिरुदिता घोरा पुष्करद्वीपसंस्थितिः।<br>जम्बूद्वीपस्य तु संस्थानं कथयन्तु महर्षयः॥ १ | आदरणीय ऋषियो! आपलोगोंने पुष्करद्वीपके भयंकर अवस्थानका वर्णन किया, अब आप-लोग (कृपाकर) जम्बूद्वीपकी स्थितिका वर्णन करें॥ १॥ |
| ऋषय ऊचुः | ऋषियोंने कहा— |
| जम्बूद्वीपस्य संस्थानं कथ्यमानं निशामय।<br>नवभेदं सुविस्तीर्णं स्वर्गमोक्षफलप्रदम्॥ २<br>मध्ये त्विलावृतो वर्षो भद्राश्वः पूर्वतोऽद्भुतः।<br>पूर्वं उत्तरतश्चापि हिरण्यो राक्षसेश्वर॥ ३<br>पूर्वदक्षिणतश्चापि किंनरो वर्ष उच्यते।<br>भारतो दक्षिणे प्रोक्तो हरिर्दक्षिणपश्चिमे॥ ४<br>पश्चिमे केतुमालश्च रम्यकः पश्चिमोत्तरे।<br>उत्तरे च कुरुर्वर्षः कल्पवृक्षसमावृतः॥ ५ | राक्षसेश्वर! (अब) तुम हमलोगोंसे जम्बूद्वीपकी स्थितिका वर्णन सुनो। यह द्वीप अत्यन्त विशाल है और नव भागोंमें विभक्त है। यह स्वर्ग एवं मोक्ष-फलको देनेवाला है। जम्बूद्वीपके बीचमें इलावृतवर्ष, पूर्वमें अद्भुत भद्राश्ववर्ष तथा पूर्वोत्तरमें हिरण्यवर्ष है। पूर्व-दक्षिणमें किन्नरवर्ष, दक्षिणमें भारतवर्ष तथा दक्षिण-पश्चिममें हरिवर्ष बताया गया है। इसके पश्चिममें केतुमालवर्ष, पश्चिमोत्तरमें रम्यकवर्ष और उत्तरमें कल्पवृक्षसे समादृत कुरुवर्ष है॥ २–५॥ |