वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ९८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ४४ |
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सुनते हैं पहले हर्यश्व नामसे प्रसिद्ध एक राजा थे, जिन्हें कोई पुत्र न था, अतः वे संतान-प्राप्तिके लिये यज्ञ एवं तपस्या कर रहे थे, इसी बीच भगवान् श्रीहरि ब्राह्मणका वेष धारणकर वहाँ आये और बोले—'राजन्! आपका यह सब उपक्रम किस लक्ष्यको लेकर है?' राजा बोले—'मैं यह सब पुत्र-प्राप्तिके लिये ही कर रहा हूँ।' तब ब्राह्मणने राजासे कहा—'राजन्! तुम वामन-द्वादशीव्रतका अनुष्ठान करो।' फिर वे अन्तर्धान हो गये। राजाने यथाशीघ्र व्रतका अनुष्ठान किया और तेजस्वी, बुद्धिमान् एवं ब्राह्मणको रत्नगर्भित प्रतिमा दान कर दी। और भगवान् वामनसे प्रार्थना की—'भगवन्! अपुत्रा अदितिकी प्रार्थनापर आप स्वयं पुत्ररूपसे उनके यहाँ प्रकट हुए थे' यदि यह बात सत्य है तो मुझे भी संतान प्राप्त हो।
मुने! इस विधानसे व्रत एवं प्रार्थना करनेपर उस राजाको उग्राश्व नामक पुत्रकी प्राप्ति हुई थी, जो आगे चलकर महाबली चक्रवर्ती सम्राट् हुआ। इस व्रतमें ऐसी शक्ति है कि जिसे पुत्र न हो, वह पुत्रवान् तथा निर्धन व्यक्ति धनवान् बन जाता है। जिसका राज्य छिन गया हो, वह पुनः अपना राज्य वापस पा जाता है। व्रत करनेवाला मनुष्य मरनेपर भगवान् विष्णुके लोकको प्राप्त होता है। फिर स्वर्गमें बहुत समय प्रमोदकर वह मर्त्यलोकमें बुद्धिमान् नहुषकुमार ययातिके समान चक्रवर्ती राजा होता है। [अध्याय ४३]
जामदग्न्य-द्वादशीव्रत
दुर्वासाजी कहते हैं—इसी प्रकार मनुष्य (परशुराम-द्वादशीका व्रती साधक) वैशाखमासके शुक्लपक्षमें पूर्वोक्त नियमानुसार संकल्पकर विधिके साथ मृत्तिका लगाकर स्नान करे और फिर देवालयमें जाय। व्रती पुरुषको भक्तिपूर्वक भगवान् श्रीहरिके अवतार परशुरामकी—'ॐ जामदग्न्याय नमः' से चरण, 'ॐ सर्वधारिणे नमः' से उदर, 'ॐ मधुसूदनाय नमः' से कटिप्रदेश, 'ॐ श्रीवत्सधारिणे नमः' से जङ्घा, 'ॐ क्षत्रान्तकाय नमः' से भुजाओं, 'ॐ शितिकण्ठाय नमः' से केहुनी, 'ॐ पाञ्चजन्याय नमः' से शङ्ख, 'ॐ सुदर्शनाय नमः' से चक्र तथा 'ॐ ब्रह्माण्डधारिणे नमः' से शिरोदेशकी पूजा करे। इसके बाद पहलेकी ही तरह सामने एक कलश स्थापित करे। उसके ऊपर भगवान् परशुरामकी मूर्ति स्थापितकर पूर्वोक्त नियमानुसार दो वस्त्रोंसे उसे आच्छादित करे। कलशपर बाँसके बने पात्रमें परशुरामजीकी आकृतिवाली सुवर्णकी प्रतिमा स्थापित करे। प्रतिमाके दाहिने हाथमें फरसा धारण कराये, फिर उसकी पुष्प, चन्दन एवं अर्घ्य आदि उपचारोंसे पूजा करे। भगवान्के सामने श्रद्धा-भक्तिपूर्वक पूरी रात जागरण करे। प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर स्वच्छ वेलामें वह प्रतिमा ब्राह्मणको दे दे। इस प्रकार नियमपूर्वक व्रत करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो।
प्राचीन समयकी बात है—वीरसेन नामके एक पराक्रमी तथा भाग्यशाली राजा थे, जो पुत्रप्राप्तिके लिये तीव्र तपस्या कर रहे थे। महर्षि याज्ञवल्क्यका आश्रम वहाँसे निकट ही था, अतः एक दिन वे उन्हें देखने आये। उन तेजस्वी ऋषिको पास आते देखकर राजा वीरसेन हाथ जोड़कर खड़े हो गये और उनका विधिवत् स्वागत किया। तत्पश्चात् याज्ञवल्क्यमुनिने पूछा—'धर्मज्ञ राजन्! तुम्हारे तप करनेका क्या प्रयोजन है? तुम कौन-सा कार्य करना चाहते हो?'
राजा वीरसेनने कहा—महर्षे! मैं पुत्रहीन हूँ।