वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०० | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय ४७
दुर्वासाजी कहते हैं—इसी प्रकार आषाढ़-मासके शुक्लपक्षमें श्रीकृष्ण-द्वादशीव्रत होता है। व्रतीको चाहिये कि संकल्प करके विधिके साथ ‘ॐ चक्रपाणये नमः’, ‘ॐ भूपतये नमः’, ‘ॐ पाञ्चजन्याय नमः’, ‘ॐ सुदर्शनाय नमः’, ‘ॐ पुरुषाय नमः’ कहकर श्रीकृष्णरूपधारी भगवान् श्रीहरिकी क्रमशः भुजा, कण्ठ, शङ्ख, चक्र एवं सिरका पूजन करे। पूजा करनेके बाद इसी प्रकार अग्रभागमें वह पूर्ववत् कलश स्थापितकर उसे वस्त्रसे आच्छादित कर दे। फिर उसके ऊपर सनातन श्रीहरिके चतुर्व्यूहरूपमें अवतरित स्वर्णनिर्मित श्रीकृष्णकी प्रतिमा स्थापित करे। फिर चन्दन एवं पुष्प आदिसे उसकी विधिवत् पूजा करे। तदनन्तर पूर्वकी भाँति वह प्रतिमा वेदपाठी ब्राह्मणको दान कर दे। इस प्रकार नियमके साथ व्रत करनेवालेको जो पुण्य प्राप्त होता है, उसे सुनो—
यदुवंशमें वसुदेव नामक एक श्रेष्ठ कुशल पुरुष हुए हैं। उनकी पत्नीका नाम देवकी था। देवकी पतिके साथ-ही-साथ सभी व्रतोंका अनुष्ठान करती थीं। साथ ही वे पातिव्रत-धर्मका भी पूर्णरूपसे पालन करती थीं। परंतु उन साध्वीको कोई पुत्र न था। बहुत समय व्यतीत हो जानेपर एक बार श्रीनारदजी वसुदेवजीके घर आये। उन्होंने भक्तिपूर्वक मुनिकी पूजा की। फिर नारदजीने कहा—‘वसुदेव! मैं यह देवताओंसे सम्बन्धित एक कार्य बताता हूँ, उसे सुनो। अनघ! मैंने स्वयं देखा है, देवताओंकी सभामें जाकर पृथ्वीने कहा है—‘देवताओ! अब मैं भार ढोनेमें असमर्थ हो गयी हूँ। दुर्जन दल बाँधकर मुझे दुःख दे रहे हैं। अतः आपलोग उनका संहार करें।’
‘इस प्रकार पृथ्वीके कहनेपर उन देवताओंने भगवान् नारायणका ध्यान किया। ध्यान करते ही भगवान् श्रीहरिने उनके सामने प्रकट होकर कहा—‘देवताओ! यह कार्य मैं स्वयं करनेके लिये उद्यत हूँ, इसमें कोई संशय नहीं। मैं मनुष्यके रूपमें मर्त्यलोकमें जाऊँगा, किंतु जो स्त्री अपने पतिके साथ आषाढ़मासके शुक्लपक्षमें द्वादशीव्रतका अनुष्ठान करेगी, मैं उसीके गर्भमें निवास करूँगा।’ भगवान् श्रीहरिके ऐसा कहनेपर देवता तो अपने स्थानपर चले गये, पर मैं (नारदजी) यहाँ आ गया हूँ। मेरे आनेका विशेष कारण यह है कि आपकी कोई संतान (जीवित) नहीं है। अतः आपको यह बतला दूँ।’ इसी द्वादशीव्रतके करनेसे वसुदेवजीको श्रीकृष्ण-जैसे पुत्रकी प्राप्ति हुई। साथ ही उन यदुश्रेष्ठको विशाल वैभव भी प्राप्त हो गया। जीवनमें सुख भोगकर अन्तमें वे भगवान् श्रीहरिके परम धामको गये। मुने! आषाढ़मासमें होनेवाली द्वादशीव्रतकी यह विधि मैंने तुम्हें बतला दी। [अध्याय ४५-४६]
बुद्ध-द्वादशीव्रत
दुर्वासाजी कहते हैं—मुने! श्रावणमासके शुक्लपक्षमें एकादशीके दिन बुद्धव्रत करनेका विधान है। पूर्वकथित विधिके अनुसार चन्दन एवं फूल आदिसे भगवान् श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। ‘ॐ दामोदराय नमः’, ‘ॐ हृषीकेशाय नमः’, ‘ॐ सनातनाय नमः’, ‘ॐ श्रीवत्सधारिणे नमः’, ‘ॐ चक्रपाणये नमः’, ‘ॐ हरये नमः’, ‘ॐ मञ्जुकेशाय नमः’ तथा ‘ॐ भद्राय नमः’—इन मन्त्रोंके द्वारा क्रमशः भगवान् बुद्धरूपी श्रीहरिके चरण, कटिभाग, उदर, छाती, भुजाएँ, कण्ठ, सिर एवं शिखाकी क्रमशः अर्चना करनी चाहिये।