वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४९ ] पद्मनाभ-द्वादशीव्रत १०३
हुए। उस समय इनका रूप महान् आकर्षक था। उस समय म्लेच्छ राक्षसोंको मार पृथ्वीका भार दूर कर सुखी किया था। कभी पापियोंसे भयभीत होकर नरसमुदायने इनकी स्तुति की थी। उस अवसरपर इन्होंने नरसिंहरूपसे अवतार लिया था। बलिको मोहनेके निमित्त वामन तथा क्षत्रियोंके हाथसे राज्य वापस करनेके लिये परशुराम ये बन चुके हैं। दुष्ट शत्रुओंको दमन करनेके लिये इन्होंने कृष्णका अवतार धारण किया है। अतः पण्डितजन इनकी उपासना करते हैं। यदि पुत्र-प्राप्तिकी कामना हो तो बुद्धिमान् पुरुष इनके बालकृष्ण-रूपकी उपासना करे। रूपकी इच्छा करनेवाला इनके बुद्धावतारकी तथा शत्रुका संहार चाहनेवाला कल्कि-अवतारकी उपासना करे—यह संशय-शून्य सिद्धान्त है।
इस प्रकारकी बातें स्पष्ट करके मुनिवर नरने राजा विशालको भगवान् हरिकी यह द्वादशी बतला दी। वे राजा इस व्रतको सम्पन्न करनेमें संलग्न भी हो गये। फलस्वरूप वे चक्रवर्ती राजा हुए। मुने! उन्हीं राजा विशालसे सम्बन्ध रखनेके कारण यह बदरीवन 'विशाल' नामसे प्रसिद्ध हुआ। वे नरेश इस जन्ममें सुखपूर्वक राज्यकर अन्तमें बदरीवनमें गये, जहाँ अनेक प्रकारके यज्ञ करके भगवान् नारायणके परम पदको प्राप्त किया। [अध्याय ४८]
पद्मनाभ-द्वादशीव्रत
दुर्वासाजी कहते हैं—मुने! पूर्वकथित द्वादशीव्रतकी भाँति आश्विनमासके शुक्लपक्षमें यह व्रत भी है। उस तिथिमें पद्मनाभ भगवान्की अर्चना करनेकी विधि है। 'ॐ पद्मनाभाय नमः', 'ॐ पद्मयोनये नमः', 'ॐ सर्वदेवाय नमः', 'ॐ पुष्कराक्षाय नमः', 'ॐ अव्ययाय नमः', 'ॐ प्रभवाय नमः'—इन मन्त्रोंको पढ़कर क्रमशः भगवान् पद्मनाभके दोनों चरणों, कटिभाग, उदर, हृदय, हाथ एवं सिरकी पूजा करनी चाहिये। फिर 'सुदर्शनाय नमः' एवं 'कौमोदक्यै नमः' आदि कहकर भगवान्के आयुधोंकी पूजा करनी चाहिये। इसमें भी पूर्ववत् सामने कलश रखना चाहिये, उसपर भगवान् पद्मनाभकी सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करे, चन्दन-पुष्प आदिसे उसके अङ्गोंकी पूजा करनी चाहिये। रात बीत जानेपर प्रातःकाल फिर वह प्रतिमा ब्राह्मणको दे दे। महामते! इस प्रकार व्रत करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह बताता हूँ, सुनो।
सत्ययुगकी बात है—भद्राश्व नामसे विख्यात एक शक्तिशाली राजा थे, जिनके नामपर 'भद्राश्ववर्ष' प्रसिद्ध हुआ है। एक बार कभी अगस्त्य मुनि उनके घर आये और कहने लगे—'राजन्! मैं सात रातोंतक तुम्हारे घरपर निवास करना चाहता हूँ।' राजा भद्राश्वने सिर झुकाकर मुनिको प्रणाम किया और कहा—'मुनिवर! आप अवश्य निवास करें।' राजा भद्राश्वकी सुन्दरी रानीका नाम कान्तिमती था। उसका तेज ऐसा था मानो बारहौं सूर्य एक साथ प्रकाश फैला रहे हों। इसी प्रकार राजाकी पाँच सौ सुन्दरियाँ भी थीं; जिनका व्रत संयमित था। सुन्दर स्वभाववाली वे सौतें दासीकी भाँति प्रतिदिन कार्यमें संलग्न रहती थीं। कान्तिमतीको ही राजाकी पटरानी होनेका सौभाग्य प्राप्त था। एक बार उस (रूप और तेजसे सम्पन्न कल्याणी कान्तिमती)-पर अगस्त्य मुनिकी दृष्टि पड़ी। साथ ही उसके भयसे कार्यमें तत्पर रहनेवाली उन सुन्दरी सौतोंको भी उन्होंने देखा।