वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीवराहपुराण
ॐ नमो भगवते महावराहाय
भगवान् वराहके प्रति पृथ्वीका प्रश्न और भगवान्के उदरमें विश्वब्रह्माण्डका दर्शनकर भयभीत हुई पृथ्वीद्वारा उनकी स्तुति
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
नमस्तस्मै वराहाय लीलयोद्धरते महीम्।
खुरमध्यगतो यस्य मेरुः खणखणायते॥
दंष्ट्राग्रेणोद्धता गौरुदधिपरिवृता पर्वतैर्निम्नगाभिः
साकं मृत्पिण्डवत्प्राग्बृहदुरुवपुषाऽनन्तरूपेण येन।
सोऽयं कंसासुरारिर्मुरनरकदशास्यान्तकृत्सर्वसंस्थः
कृष्णो विष्णुः सुरेशो नुदतु मम रिपूनादिदेवो वराहः॥
अन्तर्यामी नारायणस्वरूप भगवान् वराह, नररत्न नरऋषि, उनकी लीला प्रकट करनेवाली भगवती सरस्वती और उसके वक्ता भगवान् व्यासको नमस्कार करके आसुरी सम्पत्तियोंका नाश करके अन्तःकरणपर विजय प्राप्त करानेवाले वराहपुराणका पाठ करना चाहिये।
जिनके लीलापूर्वक पृथ्वीका उद्धार करते समय उनके खुरोंमें फँसकर सुमेरु पर्वत खन-खन शब्द करता है, उन भगवान् वराहको नमस्कार है।
जिन अनन्तरूप भगवान् विष्णु (वराह)-ने प्राचीन कालमें समुद्रोंसे घिरी, वन-पर्वत एवं नदियोंसहित पृथ्वीको अत्यन्त विशाल शरीरके द्वारा अपनी दाढ़के अग्रभागपर मिट्टीके (छोटे-से) ढेलेकी भाँति उठा लिया था, वे कंस, मुर, नरक तथा रावण आदि असुरोंका अन्त करनेवाले कृष्ण एवं विष्णुरूपसे सबमें व्याप्त देवदेवेश्वर आदिदेव भगवान् वराह मेरी सभी बाधाओं (काम, क्रोध, लोभ आदि आध्यात्मिक शत्रुओं)-को नष्ट करें।
**सूतजी कहते हैं—**पूर्वकालमें जब सर्वव्यापी भगवान् नारायणने वराह-रूप धारण करके अपनी शक्तिद्वारा एकार्णवकी अनन्त जलराशिमें निमग्न पृथ्वीका उद्धार किया, उस समय पृथ्वीने उनसे पूछा।
**पृथ्वीने कहा—**प्रभो! आप प्रत्येक कल्पमें सृष्टिके आदिकालमें इसी प्रकार मेरा उद्धार करते रहते हैं; परंतु केशव! आपके स्वरूप एवं सृष्टिके प्रारम्भके विषयमें मैं आजतक न जान सकी। जब