वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ७७] मेरुपर्वतका वर्णन १३७
आठ दिक्पालोंकी पुरियोंका वर्णन
भगवान् रुद्र कहते हैं—द्विजवरो! उस मेरुपर्वतका पूर्वी देश परम प्रकाशमय है। उसमें चक्रपाद नामका एक पर्वत है, जिसकी अनेक धातुओंसे विद्योतित होनेसे अद्भुत शोभा होती है। इस परम रमणीय चक्रपाद पर्वतको सम्पूर्ण देवताओंकी पुरी कहते हैं। वहाँ किसीसे पराजित न होनेवाले बलाभिमानी देवताओं, दानवों और राक्षसोंका निवास है। उस पुरीमें सोनेकी बनी हुई चहारदीवारियाँ तथा मनोहर तोरण शोभा बढ़ाते रहते हैं। उस पुरीके ईशानकोणमें एक तेजःपूर्ण स्थानपर इन्द्रकी अमरावतीपुरी है। उस परम रमणीय पुरीमें सभी दिव्य पुरुष निवास करते हैं। सैकड़ों विमानोंकी वहाँ पङ्क्तियाँ लगी रहती हैं। बहुत-सी वापियाँ उसकी शोभा बढ़ाती हैं। वहाँ हर्षका कभी भी ह्रास नहीं होता। बहुत-से रंग-बिरंगे फूल उसकी मनोहरता बढ़ाते रहते हैं। पताकाएँ एवं ध्वजाएँ माला-सी बनकर उसे अत्यन्त मनोमोहक बनाती हैं। ऋद्धि-सिद्धियोंसे परिपूर्ण उस पुरीमें देवता, यक्षगण, अप्सराएँ और ऋषिसमुदाय निवास करते हैं। उस पुरीके मध्य-भागमें हीरे एवं वैदूर्यमणिकी वेदीसे मण्डित 'सुधर्मा' नामकी सभा है, जो अपने गुणोंके कारण तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। वहाँ समस्त सुरगण एवं सिद्ध-समुदायोंसे घिरे शचीपति सहस्राक्ष इन्द्र विराजते हैं।
इस अमरावतीपुरीसे कुछ दूर दक्षिणमें महाभाग अग्निदेवकी पुरी है, जो 'तेजोवती' नामसे प्रसिद्ध है तथा जिसमें अग्निके समान गुण पाये जाते हैं। उसके दक्षिणमें यमराजकी 'संयमनीपुरी' है। अमरावतीके नैर्ऋत्य-कोणमें विरूपाक्षकी 'कृष्ण-वतीपुरी' है। उसके पीछे पश्चिम दिशामें जलके स्वामी महात्मा वरुणकी 'शुद्धवतीपुरी' है। इसी प्रकार उसके वायव्य कोणमें वायु देवताकी 'गन्धवतीपुरी' है। इस 'गन्धवती'के पीछे अर्थात् उत्तर दिशामें गुह्यकोंके स्वामी कुबेरकी मनोहर 'महोदयापुरी' है। इस पुरीमें वैदूर्यमणिसे बनी हुई वेदियाँ है। इसी प्रकार ब्रह्मलोककी आठवीं कर्णिका या अन्तर्पटपर ईशानकोणमें महान् पुरुष भगवान् रुद्रकी पुरी शोभा पाती है, जो 'मनोहरा' नामसे प्रसिद्ध है। इसमें अनेक प्रकारके भूतसमुदाय, विविध भाँतिके पुष्प, ऊँचे भवन, वन और आश्रम हैं, जिनसे उसकी अद्भुत शोभा होती है। भगवान् रुद्रका यह लोक सबके लिये प्रार्थनाकी विषय—अभिलषणीय वस्तु है। [अध्याय ७६]
मेरुपर्वतका वर्णन
भगवान् रुद्र कहते हैं—द्विजवरो! मेरुपर्वतके मध्यभागमें कर्णिकाका मूल है। उसका परिमाण एक सहस्र योजन है। अड़तालीस हजार योजनकी गोलाईसे शोभा पानेवाले पर्वतराज मेरुका यह मूल भाग है। उसकी मर्यादाके व्यवस्थापक आठों दिशाओंमें आठ सुन्दर पर्वत हैं। जठर और देवकूट नामसे प्रसिद्ध पूर्व दिशामें सीमा निश्चित करनेवाले भी दो पर्वत हैं। मेरुके अग्रभागमें मर्यादाकी रक्षा करनेवाले चार पर्वतोंके आगे चौदह दूसरे पर्वत हैं जो सात द्वीपवाली पृथिवीको अचल रखनेमें सहायक हैं। अनुमानतः उन पर्वतोंकी तिरछी होती हुई ऊपरतककी चौड़ाई दस हजार योजन होगी। इसपर जगह-जगह हरिताल, मैनशिला आदि धातुएँ तथा सुवर्ण एवं मणिमण्डित गुफाएँ हैं; जो इसकी शोभा बढ़ाती हैं। सिद्धोंके अनेक भवन तथा क्रीडास्थानसे