भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१४२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ८१

इसी प्रकार पञ्चकूट और कैलासपर्वतोंके बीचमें 'हंसपाण्डुर' नामसे प्रसिद्ध एक भूमिखण्ड है, जिसकी लम्बाई हजार योजन और चौड़ाई सौ योजन है। क्षुद्र प्राणी उसे लाँघनेमें असमर्थ हैं। वह भूभाग मानो स्वर्गकी सीढ़ी है। अब हम मेरुकी पश्चिम दिशाके पर्वतों एवं नदियोंका वर्णन करते हैं। सुपार्श्व और शिखिशैलसंज्ञक पर्वतोंके मध्यमें 'भौमशिलातल' नामक एक मण्डल है। वह चारों तरफ सौ योजनतक फैला है। वहाँकी भूमि सदा तपती रहती है, जिससे कोई इसे छू नहीं सकता। उसके बीचमें तीस योजनतक फैला हुआ अग्निदेवका स्थान है। वहाँ भगवान् नारायण लोकका संहार करनेके विचारसे 'संवर्तक' नामक अग्निका रूप धारणकर बिना लकड़ीके ही सर्वदा प्रज्वलित रहते हैं। यहीं कुमुद और अञ्जन—ये दोनों श्रेष्ठ शैल हैं। उनके बीचमें 'मातुलुङ्गस्थली' सुशोभित होती है। इसका विस्तार सौ योजन है। वहाँ जानेमें सभी प्राणी असमर्थ हैं। पीले रंगवाले फलोंसे उसकी बड़ी शोभा होती है। वहाँ सिद्ध पुरुषोंसे सम्पन्न एक पवित्र तालाब है। यहीं बृहस्पतिका भी एक वन है। ऐसे ही पिंजर और गौर नामवाले दो पर्वतोंके बीचमें छोटी-छोटी अनेक नदियाँ हैं। भँवरोंसे व्याप्त बड़े-बड़े कमल उन द्रोणियोंकी शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ भगवान् नारायणका देवमन्दिर है। इसी प्रकार शुक्ल तथा पाण्डुर नामसे विख्यात महान् पर्वतोंके बीचमें तीस योजन चौड़ा तथा नब्बे योजन लम्बा एक पर्वतीय भाग है, जिसमें एक ही शिला है और वृक्ष एक भी नहीं है। वहाँ एक ऐसी बावली है, जिसका जल कभी तनिक भी नहीं हिलता। उसमें एक वृक्ष तथा एक 'स्थलपद्मिनी' है, जो अनेक प्रकारके कमलोंसे आवृत है। वह वृक्ष उस वापीके मध्यभागमें है और वहीं पाँच योजन प्रमाणवाला एक बरगदका भी वृक्ष है। वहाँ भगवान् शंकर नीले वस्त्र धारण करके पार्वतीके साथ निवास करते हैं, जिनकी यक्ष, भूत आदि सदा आराधना करते हैं। 'सहस्रशिखर' और 'कुमुद'—इन दोनों पर्वतोंके बीचमें 'इक्षुक्षेप' नामक शिखर है, जो बीस योजन चौड़ा और पचास योजन लम्बा है। उस ऊँचे शिखरपर बहुत-से पक्षी निवास करते हैं। अनेक वृक्षोंके मधुर रसवाले फलोंसे उसकी विचित्र शोभा होती है। वहाँ चन्द्रमाका महान् आश्रम है, जिसका निर्माण दिव्य वस्तुओंसे हुआ है। ऐसे ही शङ्खकूट और ऋषभके मध्यभागमें 'पुरुषस्थली' है। इसी प्रकार कपिञ्जल और नागशैल नामसे प्रसिद्ध पर्वतोंके मध्यभागमें सौ योजन चौड़ी और दो सौ योजन लम्बी एक अधित्यका है, जहाँ बहुत-से यक्ष निवास करते हैं। वह स्थली दाख और खजूरके वृक्षोंसे व्याप्त है। इसी प्रकार पुष्कर और महादेव-संज्ञक पर्वतोंके बीचमें साठ योजन चौड़ा और सौ योजन लम्बा एक बड़ा उपवन है, जिसका नाम 'पाणितल' है। वृक्षों और लताओंका यहाँ एक प्रकार सर्वथा अभाव-सा है।

[ अध्याय ८०]


देव-पर्वतोंपरके देव-स्थानोंका परिचय

भगवान् रुद्र कहते हैं—अब पर्वतोंके अन्तर्वर्ती देवस्थलोंका वर्णन करता हूँ। जिस सीतानामक पर्वतका वर्णन पहले आया है, उसके ऊपर देवराज इन्द्रकी क्रीडा-स्थली है। वहाँ उनका पारिजात नामके वृक्षोंका वन है। उसके पास ही पूर्व दिशामें 'कुञ्जर' नामक प्रसिद्ध पर्वत है, जिसके ऊपर दानवोंके आठ नगर हैं। इसी प्रकार 'वज्रपर्वत'पर राक्षसोंकी पुरियाँ हैं। उनके निवासी असुर 'नालका' नामसे प्रसिद्ध हैं और वे सभी कामरूपी भी हैं। 'महानील'पर्वतपर पंद्रह सहस्र

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