भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१५६संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय ९५

अतः आप भी उसका वरण करें।'

दूतके ऐसा कहनेपर भगवती वैष्णवीदेवी बड़े जोरोंसे हँस पड़ीं। उनके हँसते समय उस दूतको देवीके उदरमें चर और अचरसहित तीनों लोक दीखने लगे। वह उसी क्षण आश्चर्यसे घबराकर मानो चक्कर खाने लगा। अब उस दूतके उत्तरमें देवीकी प्रतिहारिणी (द्वारपालिका)-ने, जिसका नाम जया था, भगवती वैष्णवीके हृदयकी बात कहना प्रारम्भ किया।

जया बोली— 'कन्याको प्राप्त करनेकी इच्छा करनेवाले महिषने तुझसे जैसा कहा है, तुमने वैसी ही बात यहाँ आकर कही है। किंतु समस्या यह है कि इस वैष्णवीदेवीने सदाके लिये 'कौमार-व्रत' धारण कर रखा है। यहाँ इस देवीकी अनुगामिनी अन्य भी बहुत-सी वैसी ही कुमारियाँ हैं। उनमेंसे एक भी कुमारी तुम्हें लभ्य नहीं है। फिर स्वयं भगवती वैष्णवीके पानेकी तो कल्पना ही व्यर्थ है। दूत! तुम बहुत शीघ्र यहाँसे चले जाओ। तुम्हारी दूसरी कोई बात यहाँ नहीं हो सकेगी।'

इस प्रकार प्रतिहारिणीके कहनेपर विद्युत्प्रभ वहाँसे चला गया। इतनेमें ही परम तपस्वी मुनिवर नारदजी उच्च स्वरसे वीणाकी तान छेड़ते हुए आकाशमार्गसे वहाँ पहुँचे। उन मुनिने 'अहोभाग्य! अहोभाग्य!' कहते हुए उन कुमारीको प्रणाम किया और देवीद्वारा पूजित होकर वे सुन्दर आसनपर बैठ गये। फिर सम्पूर्ण देवियोंको प्रणामकर वे कहने लगे—'देवि! देवसमुदायने बड़े आदरसे मुझे आपके पास भेजा है; क्योंकि महिषासुरने संग्राममें उन्हें परास्त कर दिया है। देवि! यही नहीं, वह दैत्यराज आपको पानेके लिये भी प्रयत्नशील है। वरानने! देवताओंकी यह बात आपको बताने आया हूँ। देवेश्वरि! आप डटकर उस दैत्यसे युद्ध करें तथा उसे मार डालें।'

भगवती वैष्णवीसे यों कहकर नारदजी तुरंत अन्तर्धान हो गये। वे इच्छानुसार वहाँसे कहीं अन्यत्र चले गये। अब देवीने सभी कन्याओंसे कहा—'तुम सभी अस्त्र-शस्त्रसे सुसज्जित हो जाओ'। तब वे समस्त परम पराक्रमी कन्याएँ देवीकी आज्ञासे भयंकर आकार धारणकर ढाल, तलवार और धनुष आदि शस्त्रास्त्रोंसे सुसज्ज हो दैत्योंका संहार करने तथा युद्ध करनेके विचारसे डट गयीं। इतनेमें ही महिषासुरकी सेना भी देवसेनाको छोड़कर वहीं आ गयी। फिर क्या था, उन स्वाभिमानिनी कन्याओं तथा दानवोंमें युद्ध छिड़ गया। उन कन्याओंके प्रयाससे असुरोंकी वह चतुरङ्गिणी सेना क्षणभरमें समाप्त हो गयी। कितनोंके सिर कटकर पृथ्वीपर गिर पड़े। अन्य बहुत-से दैत्योंकी छाती चीरकर क्रव्यादगण रक्त पीने लगे। अनेक प्रधान दानवोंके मस्तक कट गये और वे कबन्धरूपमें नृत्य करने लग गये। इस प्रकार एक ही क्षणमें पापबुद्धिवाले वे असुर युद्धभूमिसे भाग चले। कुछ दूसरे दैत्य भागते हुए महिषासुरके पास पहुँचे। निशाचरोंकी उस विशाल सेनामें हाहाकार मच गया, उनकी ऐसी व्याकुलता देखकर महिषासुरने सेनापतिसे कहा—'सेनापते! यह क्या? मेरे सामने ही सेनाका ऐसा संहार?' तब हाथीके समान आकृतिवाले 'यज्ञहनु' (विरूपाक्ष)-ने महिषासुरसे कहा—'स्वामिन्! इन कुमारियोंने ही चारों ओरसे हमारे सैनिकोंको भगा दिया है।'

अब क्या था? महिषासुर हाथमें गदा लेकर उधर दौड़ पड़ा, जहाँ देवताओं एवं गन्धर्वोंसे सुपूजित भगवती वैष्णवी विराजमान थीं। उसे आते देखकर भगवती वैष्णवीने अपनी बीस भुजाएँ बना लीं और उनके बीसों हाथोंमें क्रमशः