वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ११२ ] कपिला-माहात्म्य, 'उभयतोमुखी' गोदान [ १७९
समय ब्राह्मणसे प्रार्थना करे—'मैं यह उभयमुखी गाय देता हूँ आप इसे स्वीकार करें। इसके प्रभावसे मेरा इस लोक तथा परलोकमें निश्चय ही कल्याण हो।' फिर गायसे प्रार्थना करे—'अपने वंशकी वृद्धिके लिये मैंने तुम्हें दानमें दिया। तुम सदा मेरा कल्याण करो।' दान लेते समय ब्राह्मण उभयमुखी धेनुसे प्रार्थना करे—'धेनो! अपने कुटुम्बकी रक्षाके लिये मैं दानरूपमें तुम्हें स्वीकार कर रहा हूँ। देवताओंकी धात्रि! तुम्हें नमस्कार। रुद्राणि! तुम्हें बार-बार नमस्कार। तुम्हारी कृपासे मेरा निरन्तर कल्याण हो। आकाश तुम्हारा दाता और पृथ्वी गृहीत्री है। आजतक कौन इसे किसके लिये देनेमें समर्थ हो सका है!' वसुंधरे! ऐसा कह लेनेपर दाता ब्राह्मणको विदा करे और ब्राह्मण उस धेनुको अपने घर ले जाय।
वसुंधरे! इस प्रकार प्रसवके समय गायका जो दान करता है, उसने मानो सात द्वीपोंवाली पृथ्वीका दान कर दिया, इसमें कोई संशय नहीं। चन्द्रमाके समान मुखवाली, सूक्ष्म मध्य भागवाली, तपाये हुए सुवर्णवर्णकी कपिला गौकी प्रसव करते समय सम्पूर्ण देवसमुदाय निरन्तर स्तुति करता है। जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर समाहितचित्तसे तीन बार भक्तिपूर्वक इस कल्प—'गोदान-विधान' को पढ़ता है, उसके वर्षभरके किये हुए पाप उसी क्षण इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे वायुके झोंकेसे धूलके समूह। जो पुरुष श्राद्धके अवसरपर इस परम पावन प्रसङ्गका पाठ करता है, उस बुद्धिमान् पुरुषके अन्तरमें दिव्य संस्कार भर जाते हैं और पितर उसकी वस्तुओंको बड़े प्रेमसे ग्रहण करते हैं। अमावास्या तिथिमें ब्राह्मणोंके सम्मुख जो इसका पाठ करता है, उसके पितर सौ वर्षके लिये तृप्त हो जाते हैं। जो पुरुष मन लगाकर निरन्तर इसका श्रवण करता है, उसके सौ वर्षोंके भी किये हुए पाप नष्ट हो जाते हैं।
पुरोहित होताजी कहते हैं—राजेन्द्र! इस परम प्राचीन गोदान-महिमाके रहस्यको भगवान् वराहने पृथ्वीको सुनाया था। सम्पूर्ण पापोंको शान्त करनेवाला यह पूरा प्रसङ्ग मैंने तुम्हें सुना दिया। माघमासके शुक्लपक्षकी द्वादशीके दिन तिलधेनुका दान करना चाहिये। इसके फलस्वरूप दाता सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न होकर अन्तमें भगवान् विष्णुके पदको प्राप्त करता है। महाराज! श्रावणमासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन सुवर्णके साथ प्रत्यक्ष धेनुका दान करना चाहिये। राजेन्द्र! ऐसे तो सभी समयमें सब प्रकारकी धेनुओंका दान करना उत्तम है, पर इस दानसे सब प्रकारके पाप शान्त हो जाते हैं और दाताको भुक्ति-मुक्ति सुलभ हो जाती है। यह प्रसङ्ग बड़ा विस्तृत है, जिसे मैंने तुमसे संक्षेपमें ही बतलाया है। धेनुओंका दान मनुष्योंके लिये सब प्रकारकी कामनाएँ पूर्ण करनेवाला है। राजेन्द्र! जो ऐसा कुछ भी नहीं करता, वह भूखसे अत्यन्त पीड़ित होता रहता है।
राजन्! इस समय कार्त्तिकका महीना चल रहा है। इसमें भौतिक रत्नों और ओषधियोंसे युक्त 'ब्रह्माण्ड' का दान करना चाहिये। देवता, दानव और यक्ष सब ब्रह्माण्डके ही अन्तर्गत हैं। यह सम्पूर्ण बीजों और रसोंसे समन्वित है। इसे हेममय बताया गया है। कार्त्तिकमें शुक्लपक्षकी द्वादशीके दिन अथवा विशेष करके पूर्णमासीके अवसरपर इस रत्नसहित ब्रह्माण्डाकृतिको श्रेष्ठ पुरोहितको भक्तिके साथ दान करे। राजन्! ब्रह्माण्डभरमें जितने तीर्थ हैं तथा जितने दान हैं, वे सभी इस ब्रह्माण्डदाता पुरुषके द्वारा सम्पन्न हो गये—ऐसा