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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१८४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय ११५

घुटनेके बल बैठकर आपकी अर्चना करते हैं, उन्हें कौन गति मिलती है? यह सब आप बतानेकी कृपा करें। भगवन्! पृथ्वीपर सोनेवाला तथा पुत्र, स्त्री और घरसे सदा उदासीन होकर जो आपकी शरणमें चला जाता है, देवेश्वर! उसे कौन-सी सिद्धि मिलती है? यह बतानेकी कृपा कीजिये।

माधव! आप सम्पूर्ण रहस्योंके ज्ञाता, विश्व-पिता और सम्पूर्ण धर्मोंके निर्णायक हैं, अतः योग और सांख्यमें निर्णीत सर्वहितावह यह निर्णययुक्त उपदेश आप ही कर सकते हैं। जो कृष्ण-नामका कीर्तन अथवा 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर आपकी उपासना करते हैं, उन्हें कौन-सी गति मिलती है? आप कृपापूर्वक यह भी बतायें।

भगवन्! मैं आपकी शिष्या और दासी हूँ। भक्तिभावसे आपकी शरणमें उपस्थित हूँ। जगद्गुरो! मुझपर आपकी कृपा है, लोकमें धर्मके प्रचार-हेतु आप इस धर्मरहस्यको मुझसे कहनेकी कृपा करें—यह मेरी आकांक्षा है।

[अध्याय ११४]


विविध धर्मोंकी उत्पत्ति

सूतजी कहते हैं—उस समय पृथ्वीकी बात सुनकर भगवान् नारायणने कहा—'जगत्‌को आश्रय देनेवाली देवि! मैं अब स्वर्गमें सुख देनेवाले साधनोंको तुम्हें बतलाऊँगा। मैं श्रद्धारहित प्राणीके सैकड़ों यज्ञों और हजारों प्रकारके दान आदि धर्मोंसे संतुष्ट नहीं होता और न मैं धनसे ही प्रसन्न होता हूँ। किंतु माधवि! यदि कोई व्यक्ति चित्तको एकाग्र करके श्रद्धापूर्वक मेरा ध्यान-स्मरण करता है, वह चाहे बहुत दोषोंसे युक्त भी क्यों न हो, मैं उसके व्यवहारसे सदा संतुष्ट रहता हूँ। पृथ्वीदेवि! जो अत्यन्त बुद्धिमान् पुरुष मुझे आधी रात, अन्धकारपूर्ण समय, मध्याह्न अथवा अपराह्नके समय निरन्तर नमस्कार करते हैं, मैं उनपर सदा संतुष्ट रहता हूँ। मेरी भक्तिमें व्यवस्थित चित्तवाला भक्त कभी भक्तिसे विचलित नहीं होता। द्वादशी तिथिके दिन मेरी भक्तिमें तत्पर रहकर जो लोग उपवास करते हैं—मेरी भक्तिके परायण वे पुरुष मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त कर लेते हैं। सुन्दरि! जो ज्ञानवान् एवं गुणज्ञ हैं तथा जिनका हृदय भक्तिसे ओतप्रोत है, ऐसे मनुष्य इच्छानुसार स्वर्गमें वास करते हैं। सुमुखि! मुझे पाना बड़ा कठिन है। थोड़े प्रयाससे मुझे कोई प्राप्त नहीं कर सकता। माधवि! भक्त जिन कर्मोंके फलस्वरूप मेरा दर्शन पाते हैं, अब उन कर्मोंका तुमसे वर्णन करता हूँ। जो श्रद्धालु व्यक्ति द्वादशी तिथिके दिन उपवास करते हैं, वे मेरा दर्शन प्राप्त कर लेते हैं। जो उपवास करके हाथमें एक अञ्जलि जल लेकर 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर सूर्यकी ओर देखते हुए जलसे उन्हें अर्घ्य प्रदान करते हैं, उनकी अञ्जलिसे जलकी जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने हजार वर्षोंतक वे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं।

देवि! जो धर्मात्मा पुरुष द्वादशी तिथिमें विधिके साथ यत्नपूर्वक मेरी उपासना करते हैं तथा श्वेत पुष्पों एवं सुगन्धित धूपसे मेरी अर्चना करते हैं और मन्दिरमें मेरी स्थापनाकर पूजा करते हैं, उन्हें जो गति मिलती है, वह सुनो। वसुंधरे! उज्ज्वल वस्त्र धारणकर मन्त्रोच्चारणपूर्वक मेरे सिरपर पुष्प-अर्पण करना चाहिये। मन्त्रोंके भाव इस प्रकार हैं—'भगवान् श्रीहरि परम पूज्य एवं मान्य पुरुष हैं, वे पुष्पोंको स्वीकार करें एवं मुझपर प्रसन्न हो जायँ। भगवान् विष्णु व्यक्त और अव्यक्त गन्धको स्वीकार करनेवाले हैं। ऐसे