वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १८६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ११६ |
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स्थित हो जाता है। जो शूद्र-दम्पति—स्त्री और पुरुष दोनों मेरी उपासना सदा भक्तिभावसे करनेवाले हों, भागवत-मतानुयायी, देश और कालकी जानकारी रखते हों, रजोगुण और तमोगुणके प्रभावसे मुक्त हों, अहंकाररहित, शुद्ध-हृदय, अतिथि-सेवी, विनम्र तथा सबके प्रति श्रद्धालु, अति पवित्र, लोभ और मोहसे दूर और बड़ोंको सदा सादर नमस्कार करनेवाले एवं मेरे स्वरूपका ध्यान करनेवाले हों तो मैं हजारों ऋषियोंको छोड़कर उन्हींपर रीझ जाता हूँ। देवि! तुमने जो चारों वर्णोंके कर्म पूछे थे, मैंने उनका वर्णन कर दिया।
देवि! इस प्रकार मेरी उपासनासे सम्बन्ध रखनेवाले गुणोंका, जिसने भक्तिके साथ अनुष्ठान कर लिया, वह मुझे पानेका अधिकारी है। अब क्षत्रियोंके लिये आचरणीय दूसरा कर्म बतलाता हूँ—उसे सुनो। वसुंधरे! यह ऐसा कर्म है, जिसके प्रभावसे उसे 'योग' सुलभ हो जाता है। वह लाभ और हानिका त्यागकर मोह और कामसे अलग होकर, शीत और उष्णमें निर्विकार रहकर, लाभ और हानिकी चिन्ता न करे। तिक्त-कटु-मधुर, खट्टा-नमकीन और कषाय स्वादवाले पदार्थोंकी भी उसे स्पृहा नहीं करनी चाहिये। उत्तम सिद्धि प्राप्त हो, इसकी भी उसे अभिलाषा नहीं करनी चाहिये। भार्या, पुत्र, माता-पिता—ये सब मुझे सेवाके लिये मिले हैं, वह मनमें ऐसा भाव रखे। पर इनमें भी आसक्ति न रखकर सदा मेरी भक्तिमें ही तत्पर रहे। वह धैर्यवान्, कार्यकुशल, श्रद्धालु एवं व्रतका पालन करनेवाला हो। उत्सुकताके साथ सदा कर्तव्य-कर्ममें तत्पर रहनेवाला, निन्दित कर्मोंसे अलग रहनेवाला और जिसका बचपन, यौवन समानरूपसे धर्ममें बीता हो, जो भोजन थोड़ा करे, कुलीनतासे रहे, सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करनेवाला हो, प्रातःकाल जगनेवाला, क्षमाशील, पर्वकालमें मौन रहनेवाला और जबतक कर्मकी समाप्ति न हो, तबतक इसे निरन्तर करनेवाला हो, ऐसा क्षत्रिय 'योग' का अधिकारी होता है। निश्चित धर्मके पथपर रहकर अखाद्य वस्तुका त्याग करे, धर्मके अनुष्ठानमें परायण रहे और अपना मन सदा मुझमें लगाये रखे। वह यथासमय मल-मूत्रका त्यागकर स्नान कर ले। पुष्प-चन्दन और धूपको मेरी पूजाकी सामग्री मानकर उनका संग्रह करनेमें सदा लगा रहे। कभी कन्दमूल और फलसे ही अपने शरीरका निर्वाह करे। कभी दूध, कभी सत्तू और कभी केवल जलके ही आहारपर रहे। कभी छठी साँझ (तीसरे दिन), कभी चौथी साँझ तथा कभी अनुकूल समयमें निर्दोष फल मिल जायँ तो उनका आहार कर ले। वसुंधरे! दस दिन, एक पक्ष अथवा एक मासमें जो कुछ स्वतः मिल जाय, उसी आहारपर रह जाय। इस प्रकार जो सात वर्षोंतक मेरी आराधना करता है तथा पूर्वकथित कर्मोंमें जिसकी स्थिति बनी रहती है, ऐसा क्षत्रिय 'योग' का अधिकारी होता है तथा योगी लोग भी उसका दर्शन करने आते हैं। [अध्याय ११५]
सुख और दुःखका निरूपण
**भगवान् वराह कहते हैं—**महाभागे! मेरे द्वारा निर्दिष्ट विधानके अनुसार जो कर्म करता-कराता है, उसे किस प्रकार सफलता प्राप्त होती है, अब मैं यह बतलाता हूँ, सुनो। मेरा भक्त एकाग्रचित्त, सुस्थिर होकर अहंकारका परित्याग कर दे एवं अपने चित्तको सदा मुझमें समाहितकर क्षमाशील, जितेन्द्रिय होकर रहे। वह द्वादशी तिथिको फल-मूल अथवा शाकका आहार करे,