वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ४ ] अश्वशिराको भगवान् नारायणकी सर्वव्यापकताका दर्शन कराना [ १७
और अमृतमय कमलसे सुशोभित हैं, उन अप्रमेय-स्वरूप भगवान् नारायणको मैं प्रणाम करता हूँ।
राजन्! इस प्रकार स्तुति करनेपर देवाधिदेव भगवान् नारायण प्रसन्न होकर मेघके समान गम्भीर वाणीमें मुझसे बोले—‘वर माँगो।’ तब मैंने उन प्रभुके शरीरमें लय होनेकी इच्छा व्यक्त की। मेरी बात सुनकर उन सनातन देवेश्वरने मुझसे कहा—‘ब्रह्मन्! अभी तुम शरीर धारण करो, क्योंकि इसकी आवश्यकता है। तुमने अभी जो तपस्या प्रारम्भ करनेके पूर्व पितरोंको नार (जल) दान किया है, अतः अबसे तुम्हारा नाम नारद होगा।’*
ऐसा कहकर भगवान् नारायण तुरंत ही मेरी आँखोंसे ओझल हो गये। समय आनेपर मैंने वह शरीर छोड़ दिया। तपस्याके प्रभावसे मृत्युके पश्चात् मुझे ब्रह्मलोककी प्राप्ति हुई। राजन्! तदनन्तर ब्रह्माजीके प्रथम दिवसका आरम्भ होनेपर मेरी भी उनके दस मानस पुत्रोंमें उत्पत्ति हुई। सम्पूर्ण देवताओंकी भी सृष्टिका वह प्रथम दिन है—इसमें कोई संशय नहीं। इसी प्रकार भगवद्धर्मानुसार सारे जगत्की सृष्टि होती है।
राजन्! यह मेरे प्राकृत जन्मका प्रसङ्ग है, जिसके विषयमें तुमने प्रश्न किया था। राजेन्द्र! भगवान् नारायणका ध्यान करनेसे ही मुझे लोकगुरुका पद प्राप्त हुआ, अतएव तुम भी उन श्रीहरिके परायण हो जाओ। [अध्याय ३]
महामुनि कपिल और जैगीषव्यद्वारा राजा अश्वशिराको भगवान् नारायणकी सर्वव्यापकताका प्रत्यक्ष दर्शन कराना
पृथ्वी बोली—भगवन्! जो सनातन, देवाधिदेव, परमात्मा नारायण हैं, वे भगवान्के परिपूर्णतम स्वरूप हैं या नहीं? आप इसे स्पष्ट बतानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह कहते हैं—समस्त प्राणियोंको आश्रय देनेवाली पृथ्वि! मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्कि—ये दस उन्हीं सनातन परमात्माके स्वरूप कहे जाते हैं। शोभने! उनके साक्षात् दर्शन पानेकी अभिलाषा रखनेवाले पुरुषोंके लिये ये सोपानरूप हैं। उनका जो परिपूर्णतम स्वरूप है, उसे देखनेमें तो देवता भी असमर्थ हैं। वे मेरे एवं पूर्वोक्त अन्य अवतारोंके रूपका दर्शन करके ही अपनी मनःकामना पूर्ण करते हैं। ब्रह्मा उन्हींकी रजोगुण और तमोगुण-मिश्रित मूर्ति हैं, उनके माध्यमसे ही श्रीहरि संसारकी सृष्टि एवं संचालन करते हैं।
धरणि! तुम उन्हीं भगवान् नारायणकी आदि मूर्ति हो, उनकी दूसरी मूर्ति जल और तीसरी मूर्ति तेज है। इसी प्रकार वायुको चौथी और आकाशको पाँचवीं मूर्ति कहते हैं। ये सभी उन्हीं परब्रह्म परमात्माकी मूर्तियाँ हैं। इनके अतिरिक्त क्षेत्रज्ञ, बुद्धि एवं अहंकार—ये उनकी तीन मूर्तियाँ और हैं। इस प्रकार उनकी आठ मूर्तियाँ हैं। देवि! यह सारा जगत् भगवान् नारायणसे ओत-प्रोत है। मैंने तुम्हें ये सभी बातें बता दीं। अब तुम दूसरा कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहती हो?
पृथ्वी बोली—भगवन्! नारदजीके द्वारा भगवान् श्रीहरिके परायण होनेके लिये कहनेपर राजा प्रियव्रत किस कार्यमें प्रवृत्त हुए? मुझे यह बतानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि! मुनिवर नारदकी विस्मयजनक बात सुनकर राजा प्रियव्रतको
* नारं पानीयमित्युक्तं पितॄणां तद्ददौ भवान्। तदाप्रभृति ते नाम नारदेति भविष्यति॥ (३।२३)