वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १९० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ११७ |
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उन्तीसवाँ सेवा-अपराध है, जो पुरुष अजीर्णसे ग्रस्त होकर मेरे पास आता है, उसका यह कार्य मेरी सेवाका तीसवाँ अपराध है। यशस्विनि! जो पुरुष मुझे चन्दन और पुष्प अर्पण किये बिना पहले धूप देनेमें ही तत्पर हो जाता है, उसके इस अपराधको मैं इकतीसवाँ मानता हूँ। मनस्विनि! भेरी आदिद्वारा मङ्गलशब्द किये बिना ही मेरे मन्दिरके फाटकको खोलना बत्तीसवाँ अपराध है। देवि! इस बत्तीसवें अपराधको महापराध समझना चाहिये।
वसुंधरे! जो पुरुष सदा संयमशील रहकर शास्त्रकी जानकारी रखता हुआ मेरे कर्ममें सदा संलग्न रहता है, वह आवश्यक कर्म करनेके पश्चात् मेरे लोकको चला जाता है। परम धर्म अहिंसामें परायण रहते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करना चाहिये। स्वयं अमानी, पवित्र और दक्ष रहकर सदा मेरे भजनके मार्गपर ही चलता रहे। साधक पुरुष इन्द्रियोंको जीतकर सेवा एवं नामादि अपराधोंसे निरन्तर बचा रहे। वह उदार हो और धर्मपर आस्था रखे, अपनी स्त्रीसे ही संतुष्ट रहे। शास्त्रज्ञ और सूक्ष्म बुद्धिसम्पन्न होकर मेरे मार्गपर आरूढ़ रहे। भद्रे! मेरी कल्पनामें चारों वर्णोंके लिये सन्मार्गमें रहनेकी यही व्यवस्था है।
वसुंधरे! जो स्त्री आचार्यमें श्रद्धा रखती है, देवताओंकी भक्ति करती है, अपने स्वामीके प्रति निष्ठा एवं प्रीति रखती है और संसारमें भी उत्तम व्यवहार करती है, वह यदि पतिसे पहले मेरे लोकमें पहुँचती है, तो वह अपने स्वामीकी प्रतीक्षा करती है। यदि पुरुष मेरा भक्त है और अपनी पत्नीको छोड़कर मेरे धाममें पहले पहुँचता है, वह भी अपनी उस भार्याकी प्रतीक्षा करता है। देवि! अब कर्मोंमें दूसरे उत्तम कर्मको तुम्हारे सामने व्यक्त करता हूँ।
सुमुखि! ऋषिलोग भी मेरी उपासनामें स्थित रहते हुए भी मेरा दर्शन पानेमें असमर्थ हैं। ऐसी स्थितिमें मेरे कर्मपरायण अन्य मनुष्योंकी तो बात ही क्या? माधवि! जो अन्य देवताओंमें श्रद्धा रखते हैं, उनकी बुद्धि मारी गयी है। वे मूर्ख मेरी मायाके प्रभावसे मुग्ध हैं, उनके चित्तमें पाप भरा हुआ है। ऐसे व्यक्ति मुझे पानेके अधिकारी नहीं हैं। भगवति! मोक्षकी इच्छा रखनेवाले जिन पुरुषोंद्वारा मैं प्राप्य हूँ, उन परम शुद्ध भाववाले पुरुषोंका विवरण सुनाता हूँ। देवि! यह आख्यान धर्मसे ओत-प्रोत है। इसे तुम्हें सुना चुका। माधवि! दुष्ट व्यक्तिको इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। जो अश्रद्धालु व्यक्ति इसका अधिकारी नहीं है, जिसने दीक्षा नहीं ली है एवं जो कभी मेरे पास आनेका प्रयत्न नहीं करता, उसे इसका उपदेश नहीं देना चाहिये। माधवि! दुष्ट, मूर्ख और नास्तिक व्यक्ति इस उपदेशको सुननेके अधिकारी नहीं हैं। देवि! यह मेरा धर्म महान् एवं ओजस्वी है, इसका मैं वर्णन कर चुका। अब सम्पूर्ण प्राणियोंके हितके लिये तुम दूसरा कौन-सा प्रसङ्ग पूछना चाहती हो, वह बताओ। (यह अध्याय 'कल्याण'—साधनाङ्कके पृष्ठ ५३८ पर 'वराहपुराण' के नामोल्लेखपूर्वक उद्धृत है।)
[अध्याय ११७]
पूजाके उपचार
भगवान् वराह बोले— भद्रे! अब मैं प्रायश्चित्तोंका तत्त्वपूर्वक वर्णन करता हूँ, तुम उसे सुनो! भक्तको चाहिये, मन्त्रविद्याकी सहायतासे यथावत् सभी वस्तु मुझे वा अन्य देवताओंको अर्पण करे। फिर आगे कहे जानेवाले मन्त्रका उच्चारणकर दीवटका काष्ठ उठाना चाहिये। दीपकाष्ठका भूमिस्पर्श करना आवश्यक है, अतः जबतक वह पृथ्वीका स्पर्श न करे, तबतक