वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२१ ] मुक्तिके साधन १९५
अनन्तरूपसे विराजनेवाले आप (प्रभु)-को मैं नमस्कार करता हूँ।' इसके बाद उसी समयसे पुनः एक अञ्जलि जल हाथमें ले और उत्तरमुख खड़ा होकर 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर इस मन्त्रका उच्चारण करे—'जो परम दिव्य, पुराण पुरुष हैं, आदि, मध्य और अन्तमें जिनकी सत्ता काम करती है, जिनके अनन्त रूप हैं, जो संसारको उत्पन्न करते तथा जो शान्तस्वरूप हैं, संसारसे मुक्त करनेके लिये जो अद्वितीय पुरुष हैं, उन जगत्स्रष्टा प्रभुका हम यजन करते हैं।'१
इसके पश्चात् उसी समयसे दक्षिणाभिमुख होकर 'ॐ नमः पुरुषोत्तमाय' यह मन्त्र पढ़कर ऐसी धारणा करनी चाहिये कि 'जो यज्ञस्वरूप हैं, एवं जिनके अनन्त रूप हैं, सत्य और ऋत जिनकी अनादिकालसे संज्ञाएँ हैं, जो अनादिस्वरूप काल हैं तथा समयानुसार विभिन्न रूप धारण करते हैं, उन प्रभुको संसारसे मुक्त होनेके लिये हम भजते हैं।' तदनन्तर काष्ठकी भाँति अपने शरीरको निश्चल बनाकर, इन्द्रियोंको वशमें करते हुए, मनको भगवान्में लगाकर इस प्रकार धारणा करे—'भगवन्! सूर्य और चन्द्रमा आपके नेत्र हैं, कमलके समान आपकी आँखें हैं, जगत्में आपकी प्रधानता है, आप लोकके स्वामी हैं, तीनों लोकोंसे उद्धार करना आपका स्वभाव है, ऐसे सोमरस पीनेवाले आप (प्रभु)-का हम यजन करते हैं।'
वसुंधरे! यदि उत्तम गति पानेकी इच्छा हो तो साधकको तीनों संध्याओंमें बुद्धि, युक्ति और मतिकी सहायता लेकर इसी प्रकारसे मेरी उपासना करनी चाहिये। यह प्रसङ्ग गोपनीयोंमें परम गोपनीय, योगोंकी परम निधि, सांख्योंका परम तत्त्व और कर्मोंमें उत्तम कर्म है। देवि! मूर्ख, कृपण और दुष्ट व्यक्तिको इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। किंतु जो दीक्षित, उत्तम शिष्य एवं दृढ़व्रती है, उसे ही इसे बताना उचित है। मुझ विष्णुके मुखारविन्दसे निकला हुआ यह गुह्य तत्त्व मरणकाल उपस्थित होनेपर भी बुद्धिमें धारण करने योग्य है। इसे कभी विस्मृत नहीं करना चाहिये। जो प्रातःकाल उठकर सदा इसका पाठ करता है, वह दृढ़व्रती पुरुष मेरे लोकमें स्थान पानेका अधिकारी है, इसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं करना चाहिये। इस प्रकार जो व्यक्ति तीनों संध्याओंमें कर्मका सम्पादन करता है, वह हीन योनियोंमें कभी नहीं पड़ता। [अध्याय ११९-१२०]
मुक्तिके साधन
**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! अब जिस कर्मके प्रभावसे प्राणीको पुनः गर्भमें नहीं जाना पड़ता, उसे बताता हूँ, तुम सुनो! यह सम्पूर्ण शास्त्रों एवं धर्मोंका निचोड़ है। जो बड़ा-से-बड़ा कार्य करके भी अपनी प्रशंसा नहीं करता और जो सदा शुद्ध अन्तःकरणसे शास्त्रीय सत्कर्मोंका अनुष्ठान करता रहता है, वह उन सत्-कर्मोंके प्रभावसे भी पुनः जन्म नहीं पाता। जो मेरा सामर्थ्यशाली भक्त होकर सबपर कृपा करता है तथा कार्य और अकार्यके विषयमें जिसे पूर्ण ज्ञान है एवं जिसकी सम्पूर्ण धर्मोंमें श्रद्धा है, वह पुनः गर्भमें नहीं आता। जो सर्दी-गरमी, वात-वर्षा और भूख-प्यासको सहता है, जो गरीब होनेपर भी लोभ, मोह एवं आलस्यसे दूर रहता है, कभी झूठ नहीं बोलता, किसीकी निन्दा नहीं करता, जो अपनी ही स्त्रीसे संतुष्ट रहता है, दूसरेकी स्त्रियोंसे दूर रहता है तथा जो सत्यवादी, पवित्र आत्मा एवं निरन्तर भगवान्का प्रिय भक्त
१. यजामहे दिव्यपरं पुराणमनादिमध्यान्तमन्तरूपम्। भवोद्भवं विश्वकरं प्रशान्तं संसारमोक्षावहमद्वितीयम्॥ (१२०।१३)