वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २०० | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२२ |
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वसुंधरे! अब राजकुमारी भी करुण-स्वरमें अपने पतिसे कहने लगी—'भद्र! इसी कारण मैं भी अपनी गुप्त बात आपको नहीं बतला सकी थी। पूर्वजन्ममें मैं जैसी जो कुछ थी, अब वह आपसे बतलाती हूँ, आप सुनें। मैं पूर्वजन्ममें आकाशमें विचरनेवाली एक चील थी। भूख और प्याससे मुझे महान् कष्ट हो रहा था। खानेके योग्य पदार्थका अन्वेषण करती हुई मैं एक पेड़पर बैठी थी, इतनेमें मुझे एक व्याध दिखायी दिया। वह वनके बहुत-से पशुओंको मारकर उनके मांसोंको लेकर उसी मार्गसे गुजर रहा था। वह भी भूखसे व्याकुल था, अतः मांस-भारको अपनी पत्नीके पास रखकर उसे पकानेके विचारसे लकड़ी ढूँढ़ने निकला। काष्ठोंको एकत्रकर वह आग जलाने ही जा रहा था कि मैंने झपटकर अपने वज्रमय कठोर नखोंसे उस मांसपिण्डको उठा लिया। पर वह मांस-भार मेरे लिये दुर्वह था, अतः उसे दूर न ले जाकर वहीं समीप ही बैठी रही। इधर वह व्याध शिकारकी खोजमें लगा ही था। अब उसकी दृष्टि मांस खाती हुई मुझ चीलपर पड़ी। फिर तो उसने धनुष उठाया और मुझपर बाणका संधान कर मार गिराया। मैं वहाँसे लुढ़ककर चक्कर काटती हुई प्राणहीन और निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिरी और मेरी जीवनलीला समाप्त हो गयी। किंतु इस 'कोकामुख' क्षेत्रकी महिमासे मेरे मनमें कोई कामना न रहनेपर भी मेरा जन्म राजाके घर हुआ। इस प्रकार मुझे आपकी स्त्री होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। मेरे पूर्वजन्मकी ही ये हड्डियाँ हैं। अब इनका थोड़ा-सा भाग ही अवशेष है।' इस 'कोकामुख' तीर्थकी ही यह महिमा है जिसके फलस्वरूप तिर्यक् (तिरछी चलने या उड़नेवाली) योनिके जीवका भी उत्तम कुलमें जन्म हो जाता है। राजकुमारने भी साधु-साधु कहकर उसका बड़ा सम्मान किया। साथ ही उसे उस क्षेत्रमें होनेवाले कुछ धार्मिक कर्मोंका भी निर्देश किया और उन्हें राजकुमारीने सम्पन्न किया। अन्य लोगोंने भी जिन्हें जो प्रिय जान पड़ा, उस धर्मका आचरण किया। उस समय उस दम्पतिने प्रसन्नतासे आदरपूर्वक ब्राह्मणोंको यथोचित द्रव्य-अन्न और रत्न भी दिये। वसुंधरे! उस समय अन्य भी जितने लोग वहाँ आये थे, उन सबने भी अपनी सामर्थ्यके अनुसार स्वयं व्रतका पालन करते हुए भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको धन दिया। इस प्रकार वे लोग कुछ दिनोंतक वहीं रुके रहे और इसके फलस्वरूप वे श्वेतद्वीपको प्राप्त हुए। उस पुण्यमय धाममें पहुँचनेपर सभी पुरुष शुक्ल वस्त्र एवं दिव्य भूषणोंसे अलंकृत होकर सुशोभित-प्रकाशित होने लगे। वहाँ रहनेवाली स्त्रियाँ भी दिव्य वस्त्र एवं अलौकिक आभूषणोंसे आभूषित होकर रूप, तेज एवं सत्त्वसे युक्त होकर प्रकाशित होने लगीं।
देवि! यह मैंने तुमसे 'कोकामुख'क्षेत्रकी महिमा बतलायी, जहाँ मत्स्य और चील आदि कामनामुक्त जीवोंने भी उत्तम गति प्राप्त की थी, जिसे चान्द्रायणव्रत करने, जलमें शयन करने तथा भगवद्धर्मोंका आचरण करनेवाले भी बड़ी कठिनतासे प्राप्त कर पाते हैं। फिर वहाँ राजकुमार और राजकुमारी—इन दोनों व्यक्तियोंने बहुतसे उत्तम धान्य और रत्न दान किये। अन्य श्रद्धालु व्यक्तियोंने भी धर्माचरणकर प्रारब्धके अनुसार वाञ्छनीय मृत्यु प्राप्त की और उन्हें श्वेतद्वीप सुलभ हो गया। वह राजकुमार भी मनुष्यलोकके सभी श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर सबसे उत्तम मेरे लोकको प्राप्त हुआ। सुमध्यमे! वहाँकी सभी सुवासिनी स्त्रियाँ भी मायाके प्रभावसे मुक्त हो गयीं। सबपर धर्म तथा मेरी भक्तिभावनाकी गहरी छाप पड़ी थी।