वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १२४ ]
करनेवाले उन देवताओंसे पूर्ण परिचित हूँ। एक हजार दिव्य वर्षोंतक मैंने केवल लीलामात्रसे तुम्हें अपने एक दाँतके ऊपर धारण कर रखा है। ब्रह्मासहित आदित्य, वसु एवं रुद्रगण तथा स्कन्द और इन्द्र आदि देवता मुझे देखनेके लिये यहाँ आना चाहते हैं।
वसुंधरा अब प्रभुके चरणोंपर गिर गयी। वह कहने लगी—'भगवन्! मैं रसातलमें पहुँच गयी थी। आपने ही मेरा वहाँसे उद्धार किया है। मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। आपमें मेरी अचल श्रद्धा है। आप सर्वसमर्थ एवं मेरे लिये परम आश्रय हैं। भगवन्! मैं आपसे पूछना चाहती हूँ कि कर्मका स्वरूप क्या है? किस कर्मके प्रभावसे आप प्राप्त होते हैं तथा नर-जन्मकी सफलता किसमें है? भगवन्! शेष ऋतुओंमें किन पुष्पोंसे किस प्रकार आपकी पूजा करनेसे अथवा किस कर्मसे आप प्रसन्न होते हैं, उसे भी बतानेकी कृपा कीजिये।
श्रीवराह भगवान् बोले—वसुंधरे! मोक्षमार्गमें अटल रहनेवाले मेरे भक्तोंने जिसका जप किया है, अब मैं उस मन्त्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। उसमें ऐसी शक्ति है कि इसके निरन्तर पाठ करनेसे मेरी अवश्य तुष्टि होती है। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! आप सम्पूर्ण मासोंमें मुख्य माधव (वैशाख) मास हैं, अतः 'माधव' नामसे आपकी भी प्रसिद्धि है। वसन्त ऋतुमें चन्दन, रस और पुष्पादिसे अलंकृत आपकी प्रतिष्ठित प्रतिमाका दर्शन करके पुण्य प्राप्त करना चाहिये। जो सातों लोकोंमें शूरवीर और नारायण नामसे प्रसिद्ध हैं, ऐसे आप प्रभुका यज्ञोंमें निरन्तर यजन किया जाता है।'
इस प्रकार ग्रीष्म-ऋतुमें भी मेरे कथनका पालन करते हुए सम्पूर्ण विधियोंका आचरण करना चाहिये। उस समय भगवान्में श्रद्धा रखनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंको प्रिय आगे कहे जानेवाले मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! सम्पूर्ण मासोंमें प्रधानरूपसे आप ज्येष्ठ मासका रूप धारण करके शोभा पा रहे हैं। इस ग्रीष्म-ऋतुमें विराजमान आप प्रभुका दर्शन करना चाहिये, जिसके फलस्वरूप सारा दुःख दूर हो जाय।'
वरारोहे! इसी प्रकार तुम भी ग्रीष्म-ऋतुमें मेरी पूजा करो। इससे प्राणी जन्म और मृत्युके चक्करमें नहीं पड़ता तथा उसे मेरा लोक प्राप्त होता है। वसुंधरे! भूमण्डलपर शाल आदि जितने भी फूलवाले वृक्ष हैं तथा उस समय जितने गन्धपूर्ण उपलब्ध पुष्प हैं, उन सबसे मुझ श्रीहरिकी अर्चना करनेकी विधि है। ऐसे ही वर्षा-ऋतुके श्रावण आदि मासोंमें भी मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये।
देवि! अब दूसरा वह कर्म तुम्हें बता रहा हूँ, जिसके प्रभावसे संसारसे मुक्ति मिल सकती है। कदम्ब, मुकुल, सरल और अर्जुन आदि देव-वृक्ष हैं। मेरी प्रतिमाकी स्थापना करके विधि-निर्दिष्ट कर्मके अनुसार इन वृक्षोंके फूलोंसे 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर मेरा आदरपूर्वक अर्चन करना चाहिये। फिर प्रार्थना करे—'लोकनाथ! मेघके समान आपकी कान्ति है। आप अपनी महिमामें स्थित हैं। ध्यानमें परायण रहनेवाले आश्रित जन आपके जिस रूपका दर्शन करते हैं, वे इस वर्षा-ऋतुमें योगनिद्रामें अभिरुचि रखनेवाले एवं मेघ-वर्णसे सुशोभित आप प्रभुके दिव्य स्वरूपका दर्शन करें। आषाढ़ मासकी शुक्ल द्वादशी तिथिके दिन इस विधानसे जो पुरुष शान्ति प्रदान करनेवाले मेरे इस पवित्र कर्मका अनुष्ठान करता है, वह जन्म और मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। देवि! ये ऋतुओंके