भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 235
२२४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२८

करते हुए उनके दोनों चरणोंको पकड़कर कहे— 'देवदेव वराह! अब मैं शस्त्रका स्पर्श करना नहीं चाहता और न अब मैं किसीकी निन्दा ही करूँगा। आपने वराहरूप धारण कर संसार-सागरसे मुक्त होनेके लिये जिन कर्मोंको करनेका निर्देश किया है, अब मैं वही करनेके लिये तत्पर हूँ। तत्पश्चात् पूर्वनिर्दिष्ट विधिके अनुसार ही अनेक प्रकारके चन्दन, धूप एवं पत्र आदि उपकरणोंसे सबकी पूजा कर दीक्षा ग्रहण करे। दीक्षा लेनेके बाद, शुद्ध भगवद्भक्त पुरुषोंको भोजन कराना चाहिये। क्षत्रियकी दीक्षाके लिये यह निश्चित विधि है।

सुन्दरि! अब वैश्यकी दीक्षाकी विधि बतलाता हूँ, वैश्य (जाति)-का साधक जिस प्रकार सिद्धि प्राप्त कर लेता है, उसे सुनो। वह भी पूर्ववत् सभी सामग्रियोंको एकत्र कर दस हाथकी चौकोर वेदी बनाये और पूर्वोक्त नियमानुसार उसे गायके गोबरसे लीप दे। फिर बकरेके चर्मसे अपने शरीरको वेष्टितकर दाहिने हाथमें गूलरका दातुन लेकर शुद्ध भगवद्भक्त पुरुषोंकी तीन बार प्रदक्षिणा करे। फिर गुरुके सम्मुख घुटनेके बल बैठकर कहे—'भगवन्! मैं वैश्य हूँ। मैं सम्पूर्ण सांसारिक प्रपञ्चोंका परित्याग कर आपकी शरणमें आया हूँ। आप प्रसन्न होकर मुझे संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाला मन्त्र देनेकी कृपा करें।' मेरा भक्तिरूप प्रसाद पानेकी इच्छावाला वह वैश्य इस प्रकार मेरी प्रार्थना कर गुरुके चरणोंका स्पर्श करे। साथ ही कहे—'गुरो! इस समय मैं आपकी कृपासे 'वैष्णवी दीक्षा' प्राप्त करनेके लिये प्रस्तुत हुआ हूँ।' इसके बाद भगवद्भक्त पुरुषोंके सामने उनमें देवताकी भावना करके अभिवादन करे। इसके पश्चात् जिसमें किसी प्रकारके अपराधका भागी न होना पड़े, ऐसा भोजन कराना उचित है।

पृथ्वि! अब द्विजेतरोंकी दीक्षाकी विधि बतलाता हूँ। जो यह दीक्षा लेता है, उसके फलस्वरूप सम्पूर्ण पापोंसे उसकी मुक्ति हो जाती है। दीक्षाकी इच्छा रखनेवालेको चाहिये कि सम्पूर्ण संसारके उपयोगी जिन द्रव्योंको मैं पहले कह चुका हूँ, वह भी उन्हीं सभीका सम्यक् प्रकारसे संग्रह करे और आठ हाथके प्रमाणकी चौकोर वेदी बनाकर उसे गोबरसे लीप दे। उसके लिये नीले बकरेका चर्म एवं बाँसका दण्ड तथा नीला वस्त्र ही उपयुक्त है। इस प्रकार इन वस्तुओंका संग्रह कर पूर्वोक्त विधिसे दीक्षाका कार्य सम्पन्न कर वह मेरी शरणमें आकर कहे—'भगवन्! मैंने अब अपने अपवित्र कर्म तथा अभक्ष्य-भक्षणका परित्याग कर दिया है।' फिर गुरुके चरणोंको पकड़कर कहे—'प्रभो! भगवान् श्रीहरिकी मुझपर कृपा हो गयी है। उनकी प्रसन्नतासे पहलेकी भाँति गोपनीय मन्त्र मुझे प्राप्त होनेका अवसर मिला है। आप मुझपर प्रसन्न हो जायँ।' पश्चात् चार बार गुरुकी प्रदक्षिणा कर उन्हें प्रणाम करे। फिर चन्दन एवं पुष्पसे गुरुकी पूजा कर भक्तोंको नियमके अनुसार भोजन कराये।'

वसुंधरे! दीक्षित हो जानेपर सभी वर्णोंको, जिस प्रकारके छत्र दिये जायें, यहाँ उसका स्पष्टीकरण किया जाता है। ब्राह्मणके लिये श्वेत, क्षत्रियके लिये लाल, वैश्यके लिये पीला तथा द्विजेतरके लिये नीला छत्र (छाता) देनेकी विधि है।

**पृथ्वी बोली—**केशव! सभी वर्णोंकी न्यायानुसार प्राप्त होनेवाली दीक्षा मैं सुन चुकी, अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि आपके कर्ममें सदा संलग्न रहनेवाले दीक्षित पुरुषके कर्तव्य क्या हैं?

**भगवान् वराह बोले—**कल्याणि! तुम जो बात पूछती हो, उसका गूढ़तम सार तथा रहस्ययुक्त