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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२३० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १३३-१३४

पृथ्‍वीने कहा—भगवन्! दातुनका उपयोग न कर जो आपके कर्मका सम्पादन करता है, उसके लिये क्या प्रायश्चित्त है ? यह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये, जिससे उसका सारा पुण्य नष्ट न हो सके।

भगवान् वराह कहते हैं—महाभागे ! इसका प्रायश्चित्त यह है कि व्यक्ति सात दिनोंतक आकाशशयन—खुली हवामें—सर्वथा बाहर सोये, इससे उसके दातुन न करनेके दोष नष्ट हो जाते हैं। भद्रे ! दातुनसम्बन्धी प्रायश्चित्त तुम्हें बतला दिया। जो व्यक्ति इस विधानसे प्रायश्चित्त करता है, उसके अपराध नष्ट हो जाते हैं।

भगवान् वराह कहते हैं—इसी प्रकार जो मनुष्य अपवित्र अवस्थामें किसी मृतक (शव)-का स्पर्श करता है, उसे गर्हितरूपमें चौदह हजार वर्षोंतक नरक-वास करना पड़ता है और जो व्यक्ति मृतकका स्पर्शकर बिना प्रायश्चित्त किये हुए मेरे क्षेत्रमें चला जाता है, उसे हजारों वर्षोंतक विविध कष्टमय निकृष्ट (नीच) योनियोंमें जाना पड़ता है।

यह सुनकर पृथिवीको बड़ा क्लेश हुआ। उन्होंने सहानुभूतिसे पूछा—भगवन्! यह तो बड़े ही दुःखकी बात है। कृपया इसके लिये भी किसी प्रायश्चित्तका वर्णन करें, जिससे प्राणी उस विकट संकटसे बच सके।

भगवान् वराह बोले—देवि! शव-स्पर्श करनेवाला मानव तीन दिनोंतक जौ खाकर और पुनः एक दिन उपवास रहकर शुद्ध हो सकता है। उसे इसका इसी रूपमें प्रायश्चित्त करना चाहिये।

इसी प्रकार जो शास्त्रकी विधिके प्रतिकूल श्मशानमें जाता है, उसके पितर भी श्मशानमें रहकर अभक्ष्यभोजी बन जाते हैं। इसलिये उसका भी प्रायश्चित्त कर लेना चाहिये।

पृथ्‍वीने पूछा—भगवन्! आपके भजन-पूजनमें लगे रहनेवालोंको भी इस प्रकारका पाप लग जाता है ? यदि कर्मसिद्धान्तसे उनको पाप लगता है तो उसका भी प्रायश्चित्त बतानेकी कृपा करें।

भगवान् वराहने कहा—ऐसा व्यक्ति सात दिनोंतक एक समय भोजन करे और तीन राततक बिना भोजन किये रहे और फिर पञ्चगव्यका पान करे। इस प्रकार प्रायश्चित्त करनेसे उसका पाप दूर हो जाता है। इसी प्रकार रजस्वला-स्त्रीका संसर्गी मनुष्य यदि भगवान्‌की मूर्तिको स्पर्श कर लेता है तो उसे भी हजार वर्षोंतक नरकमें रहना पड़ता है। नरकसे निकलकर वह पुनः अन्धा, दरिद्र और मूर्ख होता है।

रजस्वला स्त्रीका संस्पर्शदोष तपस्यासे ही दूर होता है। उसे शीतकालमें तीन राततक खुले आकाशमें शयनकर भगवत्परायण होकर तपस्याका अनुष्ठान करना चाहिये। [अध्याय १३१-१३२]


भगवान्‌की पूजा करते समय होनेवाले अपराधोंके प्रायश्चित्त

भगवान् वराह कहते हैं—पृथ्वि ! इसी प्रकार पूजाके समय मुझे स्पर्श किये हुए रहनेपर यदि शरीरके दोष वायु या अजीर्णके कारण अधोवायु निकल गयी तो इस दोषसे वह पाँच वर्षोंतक मक्खी, तीन वर्षोंतक चूहा, तीन वर्षोंतक कुत्ता एवं फिर नौ वर्षोंतक कछुएका शरीर पाता है।

देवि! जो मेरे कर्ममें—पूजा-पाठ, जप-तपमें उद्यत रहनेवाला पुरुष शास्त्रका रहस्य जानता है, फिर भी यदि उसके द्वारा अपकर्म बन जाय तो इसमें उसका प्रारब्ध एवं मोह ही कारण है।

देवि! अब मैं इसका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, सुनो। अनघे ! जिस कर्मके प्रभावसे ऐसा अपराध