वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १३७
और इक्कीस वर्षोंतक वह लौहशालामें निवास करता है। अब उसके लिये भी प्रायश्चित्त बताता हूँ, सुनो। उसकी विधि यह है—जिस-किसी मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन वह व्रत करके दिनके आठवें भागमें सायंकाल यथालब्ध आहार ग्रहण करे। फिर प्रातःकाल जब सूर्यमण्डल दिखायी पड़ने लगे, उस समय वह पञ्चगव्यका प्राशन करे। इसके प्रभावसे वह पुरुष पापसे सद्यः छूट जाता है। इस विधिके अनुसार जो प्रायश्चित्तका पालन करता है, उसके पिता-पितामह आदि पितर भी तर जाते हैं।
भूमे! जो मनुष्य पहले भेरी आदिद्वारा शब्द किये बिना ही मुझे जगाता है, वह निश्चय ही एक जन्ममें बहरा होता है। अब! मैं उसका प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिससे वह पापसे छूट जाता है। वह किसी शीत-ऋतुके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिकी रातमें आकाश-शयन करे। इस नियमका पालन करनेसे मानव पापसे शीघ्र छूट जाता है।
वसुंधरे! जो मानव बहुत अधिक भोजन करके अजीर्णयुक्त बिना स्नान किये ही मेरी उपासनामें आ जाता है, वह इस अपराधके कारण क्रमशः कुत्ता, वानर, बकरा और शृगालकी योनियोंमें एक-एक बार जन्म लेकर फिर अन्धा और बहरा होता है। बादमें इस क्लेशमय संसारको पारकर वह किसी अच्छे कुलमें उत्पन्न होता है। उस समय अपराधसे छूट जानेके कारण वह पुरुष परम शुद्ध और श्रेष्ठ भगवद्भक्त होता है। मैं अब उसके लिये प्रायश्चित्त बतलाता हूँ, जिसके पालन करनेसे वह पापसे छूट जाय। प्रायश्चित्तका स्वरूप यह है कि उसे क्रमशः तीन-तीन दिनोंतक यावक, मूलक, पायस (खीर), सत्तू तथा वायुके आहारके आधारपर रहकर फिर तीन रात आकाश-शयन करना चाहिये। फिर ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर दन्तधावनकर शरीरको परम शुद्ध करनेके लिये उसे पञ्चगव्यका प्राशन करना चाहिये। जो मानव इस विधानके अनुसार प्रायश्चित्त करता है, उसपर पापका प्रभाव नहीं पड़ सकता और वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।
महेश्वरि! यह प्रसङ्ग आख्यानोंमें महाख्यान और तपस्याओंमें परम तप है। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, वह व्यक्ति मेरे लोकको प्राप्त होता है। साथ ही वह अपने दस पूर्व और दस पीछेकी पीढ़ियोंको तार देता है। यह प्रसङ्ग परम मङ्गलकारी तथा सम्पूर्ण पापोंको नष्ट करनेवाला है। अपने व्रतमें अटल रहनेवाला जो भागवत पुरुष इसका सदा पाठ करता है, वह सम्पूर्ण अपराधोंका आचरण करके भी उससे लिप्त नहीं होता। यह जप करने योग्य तथा परम प्रमाणभूत शास्त्र है। इसे मूर्खोंके समाजमें अथवा निन्दित व्यक्तियोंके सामने नहीं पढ़ना चाहिये। देवि! तुमने मुझसे जो पूछा था, वह आचारका निर्णीत विषय मैंने तुम्हें बतला दिया, अब तुम दूसरा कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहती हो, यह बतलाओ। [अध्याय १३५-१३६]
वराहक्षेत्रकी* महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त तथा आदित्यको वरदान
पृथ्वी बोली— भगवन्! आपने मुझे तथा अपने भक्तोंको प्रिय लगनेवाली बड़ी सुन्दर बात सुनायी। महाबाहो! अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि ‘कुब्जाम्रक’क्षेत्रमें सबसे श्रेष्ठ एवं पवित्र आचरणीय व्रत क्या है? तथा भक्तोंको सुख देनेवाला इसके अतिरिक्त अन्य तीर्थ कौन-सा है?
* नन्दलाल दे आदिके अनुसार यह एटाके पासका सोरोंनामक स्थान है और अन्योंके मतसे पटनाके पासका हरिहर क्षेत्र।