भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १३७] वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त २४१

पितरोंके उद्देश्यसे मृगोंके अन्वेषणमें आखेटके लिये बाघ और सिंहोंसे भरे वनमें गया; किंतु राजकुमारको पितृकार्यके उपयुक्त कोई वस्तु न दिखी। इस प्रकार वह इधर-उधर घूम ही रहा था कि उसकी दाहिनी ओरसे एक सियारिन निकली, जो (अनायास एक मृगपर छोड़े हुए) उसके बाणोंसे बिंध गयी और व्यथासे तड़पने लगी। फिर वह इस तीर्थमें जल पीकर एक शाखोट-वृक्षके नीचे गिर पड़ी। धूपसे व्याकुल तथा बाणसे बिंधी होनेके कारण न चाहनेपर भी उसके प्राण इस सोमतीर्थमें ही निकल गये। भद्रे! उसी समय सोमदत्त भी भूख-प्याससे पीड़ित होकर इस 'गृध्रवट' नामक तीर्थमें पहुँचा और विश्राम करनेके लिये ठहर गया। इतनेमें ही उस वटकी शाखापर उसे एक गीध बैठा दिखायी दिया। यशस्विनि! उसने उसे भी एक ही बाणसे मार गिराया, जो उसी वृक्षकी जड़पर गिरा। हृदयमें बाण लगनेसे उसे मूर्च्छा आ गयी और उसके प्राणपखेरू उड़ गये। उस गीधको देखकर राजकुमारके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। अतः उसने बाणोंके पर बनानेके लिये उस गीधके पंख काट लिये और उन्हें लेकर घर आया। इस प्रकार गीधके न चाहनेपर भी उस तीर्थमें मृत्यु होनेपर उसकी सद्गति हो गयी और कालान्तरमें वह कलिङ्गदेशके नरेशके घर रूपवान्, विद्वान् एवं गुणसम्पन्न राजपुत्र हुआ।

वसुंधरे! उधर जो शृगाली मरी थी, वह काञ्चीनरेशके यहाँ राजपुत्रीके रूपमें उत्पन्न हुई जो सर्वाङ्गसुन्दरी, श्यामा, अत्यन्त रूप-गुणसे सम्पन्न, कार्य-कुशल और चौंसठ कलाओंसे सम्पन्न थी। उसका स्वर कोयलके समान मधुर एवं सुखदायी था। इधर अनायास काञ्चीनरेश और कलिङ्ग-नरेशकी प्रीति बढ़ गयी और परिणामतः काञ्ची-नरेशकी कन्याका कलिङ्गराजके पुत्रके साथ विधिपूर्वक विवाह हो गया। काञ्चीनरेशने वर-वधूको दहेजमें अनेक प्रकारके रत्न, आभूषण, हाथी, घोड़े, भैंस और दास-दासियाँ दीं। फिर विवाहोपरान्त कलिङ्गराज वधूसहित अपने पुत्रको लेकर अपनी राजधानीको वापस लौट आये।

देवि! विवाहके बाद दम्पतीको प्रेमपूर्वक रहते कुछ वर्ष व्यतीत हो गये। उनकी प्रीति रोहिणी और चन्द्रमाकी तरह निरन्तर बढ़ती गयी। वे नन्दनवनकी उपमावाले वन-उपवन-उद्यानादि एवं क्रीडाके अन्य दिव्यस्थलोंमें आनन्दपूर्वक विहार करते। इधर कलिङ्ग-राजकुमार अपनी बुद्धि, सुशीलता और श्रेष्ठ कर्मोंसे नगरकी जनताको भी परम संतुष्ट रखता। उधर अन्तःपुर एवं नगरकी स्त्रियोंको राजकुमारीने संतुष्ट कर रखा था। इस प्रकार उन दोनोंके सौम्य गुणों एवं शीलयुक्त व्यवहारसे सभी राज्यवासी संतुष्ट थे।

एक बार उस राजकुमारीने उस राजकुमारसे वार्तालापके प्रसङ्गमें कहा कि मैं आपसे एक रहस्यकी बात पूछती हूँ। यदि मुझपर आपका स्नेह हो तो आप मुझे उसे बतानेकी कृपा करें। पत्नीकी बात सुनकर राजकुमारने कहा—'भद्रे! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि तुम्हारे मनकी अभिलाषा पूरी करनेके लिये अवश्य प्रयत्न करूँगा। देवि! सत्यके आधारपर ही विश्व ठहरा है। सत्य भगवान्‌का ही स्वरूप है और तपस्याका मूल भी सत्य ही है तथा सत्यके आधारपर ही हमारा राज्य टिका हुआ है। मैं कभी भी मिथ्या नहीं बोलता। इसके पहले भी मेरे मुँहसे कभी झूठी बात नहीं निकली है। अतः तुम कहो, मैं तुम्हारे लिये कौन-सा कार्य करूँ? हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, सवारी, धन अथवा परम श्रेष्ठ अपना पट्टबन्ध, शिरोमुकुटतक मैं तुम्हें समर्पण करनेको तैयार हूँ।