भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 254

अध्याय १३७ ] वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त २४३

दीक्षित हो गया हूँ, अतः कोई भी स्त्री अथवा पुरुष मेरा स्पर्श न करे; अन्यथा वह दण्ड-विधानके अनुसार मेरा वध्य हो सकता है?'

वसुंधरे! कलिङ्गनरेश इस प्रकारकी आज्ञा देकर शीघ्रतापूर्वक चलकर जहाँ राजकुमारी रहती थी, वहाँ पहुँचा और अपनी स्त्रीको देखा। वह चारपाईके पास नीचे आसन लगाकर बैठी थी और अपने मनमें इष्टदेवका चिन्तन कर रही थी, साथ ही सिरके दर्दसे पीड़ित होकर रो रही थी। राजकुमारी कह रही थी—'मैंने पूर्वजन्ममें कौन-सा ऐसा दुष्कर कर्म किया है, जिससे मैं इस दयनीय दशाको प्राप्त हो गयी हूँ। मैं अनाथकी भाँति क्लेश सहती हूँ, किंतु मेरे पतिदेवको भी इसका पता नहीं है। मेरा व्रत सब तरहसे विकृत ही कहा जा सकता है। मेरा बड़ा सौभाग्य होता यदि मैं कभी सौकरवक्षेत्रमें जा सकती और मेरे हृदयमें जो बात बसी है, उसे अपने पतिसे कह पाती।'

कलिङ्गनरेश अपनी स्त्रीकी बात सुन रहा था। उसने उठकर दोनों हाथोंसे अपनी पत्नीको पकड़कर कहा—'भद्रे! तुम यह क्या कह रही हो? अपनेको तुम इस प्रकार बार-बार कोसती क्यों हो? तुम प्रारब्धकी बातोंको क्यों सोचती हो और अपनेको क्यों कोसती हो? तुम्हें तो यह एक महान् शिरोरोग है। इसे दूर करनेके लिये अष्टाङ्ग-कुशल वैद्य क्या तुम्हें नहीं मिलते, जो तुम्हारे सिरकी कठिन पीड़ाको दूर कर सकें? वायु, कफ, पित्त आदि रोगोंसे तुम्हें संनिपात हो गया है, अथवा असमयपर तुममें पित्तका प्रकोप हो गया है। तुम व्रतके बहाने व्यर्थमें इतना क्लेश क्यों पाती हो? तुम कहती हो कि 'सौकरवक्षेत्रमें चलनेपर कहूँगी', इस विषयमें ऐसा क्या गोपनीय है, जिसे तुम कहना नहीं चाहती हो?'

अब राजकुमारी बड़े संकोचमें पड़ गयी। वह दुःखसे पीड़ित तो थी ही, उसने स्वामीके चरण पकड़ लिये और कहने लगी—'महाराज! आप मुझपर प्रसन्न हों, यह बात आप इस समय पूछ रहे हैं, यह ठीक नहीं। वीरवर! मेरा यह वृत्त जन्मान्तरीय कर्मोंसे सम्बद्ध है।' पत्नीकी बात सुनकर कलिङ्गदेशके उस नरेशने परम हित करनेके विचारसे उसके प्रति मधुर वचन कहा—'देवि! मेरे सामने यह कौन-सी गोपनीय बात है? तुम ठीक-ठीक बात बतला दो।' पतिकी बात सुनकर राजकुमारीकी आँखें आश्चर्यसे भर गयीं। वह मधुर वाणीमें बोली—'प्राणनाथ! शास्त्रोंके अनुसार स्त्रीके लिये स्वामी ही धर्म, अर्थ और सर्वस्व है। उसका पति ही परमात्मा है। अतएव आप जो मुझसे पूछ रहे हैं, वह मुझे अवश्य कहना चाहिये। फिर भी जो बात मेरे हृदयमें बैठ गयी है उसे कहनेमें मैं असमर्थ हूँ। पीड़ा पहुँचानेवाली मेरी यह बात आप मुझसे पूछें, यह उचित नहीं जान पड़ता। महाभाग! इस दुःखका मेरे शरीरसे दूर होना असम्भव-सा दीखता है। आप सुखमें सदा समय बिताते हैं, यह बड़ी अच्छी बात है। स्वामिन्! मेरे समान बहुत-सी स्त्रियाँ आपके अन्तःकरणमें हैं। जिन्हें आप विविध प्रकारके अन्न और उत्तम भूषण दिया करते हैं और वे आपकी सेवा करती हैं, फिर मुझसे आपका क्या तात्पर्य? राजन्! आप हाथी, रथ और घोड़ेपर यात्रा किया करते हैं, यह सब ठीक है। पर राजन्! इस विषयमें मुझसे आपको कुछ नहीं पूछना चाहिये। आप मेरे इष्ट देवता, गुरु एवं साक्षात् सनातन यज्ञपुरुष हैं। मानद! मेरे लिये आप धर्म, अर्थ, काम, यश और स्वर्ग सब कुछ हैं। आपके पूछनेपर मुझको चाहिये कि सदा सभी बातें सत्य एवं प्रिय कहूँ। क्योंकि सभी