वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १४३
मुझमें लगा दो। ज्ञान और योगका आश्रय लेकर मनको एकाग्र करती हुई तुम मेरी उपासना करो। जो निरन्तर मुझमें चित्त लगाकर अपने व्रतमें निश्चित रहता हुआ मेरी उपासना करता है, वह मेरे सांनिध्य (समीपता)-को प्राप्तकर अन्तमें मुझमें ही लीन हो जाता है।
वसुंधरे! पुनः दूसरी बात बताता हूँ, सुनो। ज्ञानका चित्तसे सम्बन्ध है और क्रियाका योगसे। ज्ञानी पुरुष कर्मके प्रभावसे मेरे स्थानको प्राप्त कर लेते हैं। योगके सिद्ध पारगामी पुरुष भी वहीं जाते हैं। मेरे मार्गका अनुसरण करनेवाले मानव ज्ञान, योग एवं सांख्यका चित्तमें चिन्तन न होनेपर भी परम सिद्धि पानेके अधिकारी हो जाते हैं। देवि! ऋतुकाल उपस्थित होनेपर मुझमें श्रद्धा रखनेवाली स्त्रीका कर्तव्य है कि वह तीन दिनोंतक निराहार रहे। उसे वायुके आहारपर समय व्यतीत करना चाहिये। चौथे दिन गृह-सम्बन्धी कार्योंको सम्पन्न करे। उस समय अन्य स्थानोंपर जाना निषिद्ध है। सर्वप्रथम सिर धोकर स्नान करे, फिर निर्मल श्वेत वस्त्र धारण करे। वसुंधरे! चित्तपर अपना अधिकार रखकर जो स्त्री मन और बुद्धिको सम रखकर कर्म करती है, वह सदा मेरे हृदयमें निवास करती है। भोजनकी सामग्रीको मेरा नैवेद्य मानकर ग्रहण करना चाहिये। भूमे! इन्द्रियोंको वशमें रखकर चित्तको एकाग्र करे और तब संन्यासयोगकी साधना करनी चाहिये। स्त्री, पुरुष या नपुंसक जो कोई भी हो, उन्हें नित्य ऐसा करना ही चाहिये। ज्ञान रहते हुए भी मेरे कर्मके सम्बन्धमें जो योगकी सहायता नहीं लेते और सांसारिक कार्योंमें जीवन व्यतीत करते हैं, ऐसे मानव आजतक भी मेरे विषयमें अनभिज्ञ हैं। देवि! वे सांसारिक मोहमें लिप्त मुझे नहीं जानते। उनमें माता, पिता, पुत्र और स्त्री—ये सैकड़ों एवं हजारों मोहकी शृङ्खलाएँ हैं, जिनमें वे चक्कर काटते रहते हैं और मुझे नहीं जान पाते। मोह और अज्ञानसे ढका हुआ यह संसार अनेक प्रकारकी आसक्तियोंमें बँधा है। इससे मनुष्य मुझमें चित्त नहीं लगा पाता। मृत्युके समय ये सभी साथ छोड़कर इस संसारसे पृथक्-पृथक् स्थानपर चले जाते हैं। फिर सब अपने-अपने कर्मोंके अनुसार जन्म पाते हैं। पृथ्वीदेवि! संसारके मोहमें पड़े हुए प्रायः सभी मानव अज्ञानी ही बने रहते हैं। इसीमें उनका पूरा समय बीत जाता है। पुनः उनके पुनर्जन्म होंगे और मृत्यु भी, किंतु मेरे सांनिध्यके लिये कोई यत्न नहीं करता।
वसुंधरे! यह सब ‘संन्यासयोग’ का विषय है। जिसे इसके रहस्यका ज्ञान हो जाता है, वह सदा योगमें लगकर संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं। जो मानव प्रातःकाल उठकर निरन्तर इसका श्रवण करता है, उसे पुष्कल सिद्धि प्राप्त हो जाती है और अन्तमें वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।
[अध्याय १४२]
मन्दारकी महिमाका निरूपण
**भगवान् वराह कहते हैं—**सुन्दरि! गङ्गाके दक्षिण तटपर तथा विन्ध्यपर्वतके पिछले भागमें मेरा एक परम गुह्य एकान्त स्थान है, जिसे मेरे प्रेमी भक्त मन्दार नामसे पुकारते हैं। देवि! वहीं त्रेतायुगमें 'राम' नामसे प्रसिद्ध एक महान् प्रतापी पुरुषका प्राकट्य होगा। वे वहाँ मेरे विग्रहकी स्थापना करेंगे, इसमें संदेह नहीं।
**पृथ्वी बोली—**देवेश नारायण! आपने धर्म एवं अर्थसे संयुक्त मन्दार नामक जिस स्थानका वर्णन किया है, उस स्थानपर मनुष्योंके लिये