वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ६ ] पुण्डरीकाक्षपार-स्तोत्र, राजा वसुके जन्मान्तरका प्रसङ्ग २५
उठे। तुम वहाँसे घर लौट आये। तुमने यह घटना किसी औरको भी बतला दी। राजन्! कुछ समय बीत जानेपर सहसा एक रातको ब्रह्महत्याके भयसे तुम आतंकित हो उठे; अतः तुमने विचार किया कि इस ब्रह्महत्याकी शान्तिके लिये मैं कोई ऐसा प्रयत्न करूँ, जिसके परिणामस्वरूप इस पापसे मुक्त हो जाऊँ। महाराज ! तदनन्तर समय आनेपर भगवान् नारायणका अनवरत चिन्तन करते हुए तुमने परम पवित्र द्वादशीपर्यन्त व्याप्त शुद्ध एकादशीका उपवासपूर्वक व्रत किया। फिर दूसरे दिन तुमने 'भगवान् नारायण मुझपर प्रसन्न हों', इस संकल्पके साथ विधिपूर्वक गोदान किया। इसके बाद किसी दिन उदर-शूलकी असह्य पीड़ासे तुम्हारे प्राण-पखेरू उड़ गये। किंतु द्वादशीव्रत-पुण्यके होते हुए भी तुमको मुक्ति प्राप्त न हो सकी। इसका कारण मैं बताता हूँ, सुनो। तुम्हारी सौभाग्यवती रानीका नाम नारायणी था। मृत्युके समय जब तुम्हारे प्राण कण्ठमें आ गये थे, उस समय तुम्हारे मुखसे उसके नामका उच्चारण हुआ, उसीसे तुम्हें उत्तम गतिकी प्राप्ति हुई और तुमको एक कल्पपर्यन्त विष्णुलोकमें निवास प्राप्त हुआ।* विष्णुलोकमें गमन करनेके पूर्व मैं तुम्हारे शरीरमें स्थित था। अतः ये सब बातें मैं जानता हूँ। मैं उस समय एक भयंकर
* उक्त प्रकरणसे यह शङ्का होनी स्वाभाविक है कि क्या विष्णुलोकमें गमनके पश्चात् इस जन्म-मृत्युमय संसारमें लौटकर पुनः आना पड़ता है ? क्योंकि भगवद्गीतामें स्वयं श्रीभगवान्ने—'यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम' कहकर अपने परमधामको प्राप्त होनेपर जीवका इस संसारमें पुनरागमन न होनेकी घोषणा की है। इस विषयमें प्रमाणभूत ग्रन्थोंका आश्रय लेकर विचार करनेसे निम्नाङ्कित बातें प्रतीत होती हैं—
श्रीभगवान्के परम विशुद्ध वैकुण्ठधामके भी कई स्तर हैं। यद्यपि ये सभी स्तर प्राकृत-प्रपञ्चसे अतीत हैं, फिर भी प्रलयकालमें इसके बाह्य अंशका प्रलय होता है, जब कि आभ्यन्तर भाग उस समय अन्तर्हित हो जाता है। राजा वसुका कल्पपर्यन्त विष्णुलोकमें निवास वैकुण्ठके किसी बाह्य स्तरपर कल्पान्तजीवी पुरुषोंका निवास होनेकी ओर संकेत करता है। श्रीमद्भागवतसे भी इसकी पुष्टि होती है—
किमन्यैः कालनिर्धूतैः कल्पान्ते वैष्णवादिभिः। (७।३।१)
इसी कल्पान्तपर्यन्त आयुवाले लोकके ऊपर ध्रुवकी स्थिति मानी गयी है। इसी ग्रन्थमें श्रीभगवान् नारायण ध्रुवको वर देते समय कहते हैं—
नान्यैरधिष्ठितं भद्र यद्भ्राजिष्णु ध्रुवक्षिति। यत्र ग्रहर्क्षताराणां ज्योतिषां चक्रमाहितम्॥
मेढ्यां गोचक्रवत्स्थास्नु परस्तात्कल्पवासिनाम्। (४।९।२० १/२)
भद्र ! जिस तेजोमय अविनाशी लोकको आजतक किसीने प्राप्त नहीं किया, जिसके चारों ओर ग्रह, नक्षत्र और तारागण एवं ज्योतिष्चक्र उसी प्रकार चक्कर काटते रहते हैं, जिस प्रकार स्थिर मेढ़ीके चारों ओर दाँवरीके बैल घूमते रहते हैं। अवान्तर कल्पपर्यन्त जीवन धारण करनेवालोंके लोकसे परे उसकी स्थिति है।
इसी प्रकार सनकादि महर्षियोंके वैकुण्ठलोक-गमनके समय वैकुण्ठके छः स्तरोंको पार करके सप्तम स्तरपर उन्हें जय-विजय आदि भगवत्पार्षदोंके दर्शन होते हैं—
तस्मिन्नतीत्य मुनयः षडसज्जमानाः कक्षाः समानवयसावथ सप्तमायाम्।
देवावचक्षत गृहीतगदौ परार्ध्यकेयूरकुण्डलकिरीटविटङ्कवेषौ ॥ ( श्रीमद्भा० ३। १५। २७)
भगवद्दर्शनकी लालसासे अन्य दर्शनीय सामग्रीकी उपेक्षा करते हुए वैकुण्ठधामकी छः ड्योढ़ियाँ पार करके जब वे सातवींपर पहुँचे तो वहाँ उन्हें हाथमें गदा लिये दो समान आयुवाले देवश्रेष्ठ दिखलायी दिये जो बाजूबंद, कुण्डल और किरीट आदि अनेकों अमूल्य आभूषणोंसे अलंकृत थे।
वैकुण्ठलोकके स्तरभेदके समान मुक्तिके भी स्तर-भेद हैं। मृत्युके साथ ही भगवान्के परमधाममें प्रवेश किया जाता है अथवा मृत्युके बाद कई स्तरोंमें होते हुए भी वहाँ पहुँचा जाता है। यह दूसरे प्रकारकी गति भी परमा गति ही है। कारण, इस स्तरसे अधोगति नहीं होती, क्रमशः ऊर्ध्वगति ही होती है और अन्तमें परमपदकी प्राप्ति हो जाती है। तथापि यह परमा गति होनेपर भी है अपेक्षाकृत निम्न अधिकारीके लिये ही।
राजा वसुको भी वासनाक्षय न होनेके कारण सद्योमुक्ति नहीं प्राप्त हुई। उनके द्वारा प्राण-त्यागके समय रानी नारायणीका नामोच्चारण होनेसे उसके फलस्वरूप उनको कल्पपर्यन्त विष्णुलोकमें वास प्राप्त होकर जन्मान्तरमें वासना एवं तज्जनित पापक्षयके द्वारा परम ज्योतिमें लीन होनेका वर्णन उनकी क्रममुक्ति प्राप्त होनेकी सूचना देता है।